दर्द बैठा कुण्डली मारे कहीं जाता नहीं है।
हो गई हावी हताशा अब कोई भाता नहीं है।।
जी रहे हैं लाश बन कर आज दुनिया में मृदुल मन,
देख कर चालें दुरंगी है सभी के भीत जीवन।
छल कपट से हैं सुसज्जित आज सब के काम साथी,
इसलिए तो प्यार उनका रास अब आता नहीं है।।
दर्द बैठा कुण्डली मारे कहीं जाता नहीं है।
अपनी ढपली – राग अपने में सभी मदमस्त जीते,
स्वार्थ की मदिरा यहां पर रात-दिन मनुजात पीते।
चाम देने को है तत्पर पर न देंगे दाम जग को,
जो लुटा सरवस्वदे ऐसा कोई दाता नहीं है।।
दर्द बैठा कुण्डली मारे कहीं जाता नहीं है।
रस टपकना बन्द है रसना का जो जग को लुभाता,
पीठ देकर अब खड़ा है जो कभी प्रिय को बुलाता।
बेरुखी व्यवहार में छायी ‘सुधाकर’ के निरन्तर,
प्यार की मलहार वह अब लेश भी गाता नहीं है।
दर्द बैठा कुण्डली मारे कहीं जाता नहीं है।
हो गई हावी हताशा अब कोई भाता नहीं है।।
✍️ कवि – श्री सुधाकर श्रीवास्तव ‘सुधाकर’

