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पता नहीं क्या सोच सुधाकर रखा मेरा नाम

पता नहीं क्या सोच सुधाकर रखा मेरा नाम ।
बीता नित्य तमस में जीवन, बना मैं ज्योतित धाम ।
पता नहीं क्या सोच सुधाकर रखा मेरा नाम ।।

सीधा पन्थ न चलना सीखा, चला दुरंगी चाल ।
कपट भरे मम काम देखकर, डरता मुझसे काल ।
पावन प्राण न देखे मैंने, देखी गोरी चाम ।
पता नहीं क्या सोच सुधाकर रखा मेरा नाम ।।

पीड़ पोटली सिर पर रखकर, भटक रहा हूँ नित्य ।
सुख का चाँद छिपा बदली में, दम के दुःख आदित्य ।।
सद्भावों का दूध गिराकर, पीटा दुर्मति जाम ।
पता नहीं क्या सोच सुधाकर रखा मेरा नाम ।।

शंका भरी नजर से मुझको, देखा सबने रोज ।
एक बूँद विश्वास न पाया, रहा इसी का शोक ।
गलियों से गुजरा हूँ प्रतिपल, चला न रस्ता आम ।
पता नहीं क्या सोच सुधाकर रखा मेरा नाम ।।

✍️ कवि – श्री सुधाकर श्रीवास्तव ‘सुधाकर’