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बूँद ने कहा

भोर में हो भीत एक तारिका जो घर चली, 

बूँद ओस की धरा के पन्थ पर उसे मिली ।

बोली तारिका अरी अभागी कहाँ जा रही, 

भानु की किरन तुझे अभी जलाने आ रही ।

बूँद ने कहा कि मुझे मौत का न डर ज़रा,

मौत ज़िंदगी का खेल है मेरी परम्परा । 

मृत्यु भय से यदि गगन की राह छोड़ जाऊँगी;

कैसे प्रिय समुद्र के मैं अंक में समाऊँगी ।

भानु की किरण मुझे मिटा मिटा के थक गयी, 

प्रिय मिलन की प्यास किन्तु बढ़ रही नयी नयी ।

देखना है जीत किसकी और किसकी हार है, 

उसके साथ आग है तो मेरे साथ प्यार है ।

सुनके बात बूँद की ये तारिका लजा गयी,

भेद प्रीति रीति का निराला आज पा गयी ।

किन्तु भेद मात्र जान लेना और बात है, 

प्रीति की डगर में जान देना और बात है । 

आज तक भी तारिका न प्रेम पथ पे जा सकी, 

भोर में न चन्द्रमा का साथ वह निभा सकी ।।-२

✍️ कवि – श्री मदन गोपाल सारस्वत