पता नहीं क्या सोच सुधाकर रखा मेरा नाम ।बीता नित्य तमस में जीवन, बना मैं ज्योतित धाम ।पता नहीं क्या सोच सुधाकर रखा मेरा नाम ।।
सीधा पन्थ न चलना सीखा, चला दुरंगी चाल ।कपट भरे मम काम देखकर, डरता मुझसे काल ।पावन प्राण न देखे मैंने, देखी गोरी चाम ।
पता नहीं क्या सोच सुधाकर रखा मेरा नाम ।।
पीड़ पोटली सिर पर रखकर, भटक रहा हूँ नित्य ।सुख का चाँद छिपा बदली में, दम के दुःख आदित्य ।।सद्भावों का दूध गिराकर, पीटा दुर्मति जाम ।
पता नहीं क्या सोच सुधाकर रखा मेरा नाम ।।
शंका भरी नजर से मुझको, देखा सबने रोज ।एक बूँद विश्वास न पाया, रहा इसी का शोक ।गलियों से गुजरा हूँ प्रतिपल, चला न रस्ता आम ।
पता नहीं क्या सोच सुधाकर रखा मेरा नाम ।।
In English
A poet questions his own pen name: Sudhakar means the moon, yet the life it named was spent in darkness. Each stanza of self-reckoning returns to that one line.