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प्रबंध-काव्य

कुरूक्षेत्र – प्रथम सर्ग

वीर रस, करुण रस

वह कौन रोता है वहाँ-इतिहास के अध्याय पर,जिसमें लिखा है, नौजवानों के लहु का मोल हैप्रत्यय किसी बूढे, कुटिल नीतिज्ञ के व्याहार का;जिसका हृदय उतना मलिन जितना कि शीर्ष वलक्ष है;जो आप तो लड़ता नहीं,कटवा किशोरों को मगर,आश्वस्त होकर सोचता,शोणित बहा, लेकिन, गयी बच लाज सारे देश की ?

और तब सम्मान से जाते गिनेनाम उनके, देश-मुख की लालिमाहै बची जिनके लुटे सिन्दूर से;देश की इज्जत बचाने के लिएया चढा जिनने दिये निज लाल हैं ।

ईश जानें, देश का लज्जा विषयतत्त्व है कोई कि केवल आवरणउस हलाहल-सी कुटिल द्रोहाग्नि काजो कि जलती आ रही चिरकाल सेस्वार्थ-लोलुप सभ्यता के अग्रणीनायकों के पेट में जठराग्नि-सी ।

विश्व-मानव के हृदय निर्द्वेष मेंमूल हो सकता नहीं द्रोहाग्नि का;चाहता लड़ना नहीं समुदाय है,फैलतीं लपटें विषैली व्यक्तियों की साँस से ।

हर युद्ध के पहले द्विधा लड़ती उबलते क्रोध से,हर युद्ध के पहले मनुज है सोचता, क्या शस्त्र ही-उपचार एक अमोघ हैअन्याय का, अपकर्ष का, विष का गरलमय द्रोह का !

लड़ना उसे पड़ता मगर ।औ' जीतने के बाद भी,रणभूमि में वह देखता है सत्य को रोता हुआ;वह सत्य, है जो रो रहा इतिहास के अध्याय मेंविजयी पुरुष के नाम पर कीचड़ नयन का डालता ।

उस सत्य के आघात सेहैं झनझना उठ्ती शिराएँ प्राण की असहाय-सी,सहसा विपंचि लगे कोई अपरिचित हाथ ज्यों ।वह तिलमिला उठता, मगर,है जानता इस चोट का उत्तर न उसके पास है ।

सहसा हृदय को तोड़करकढती प्रतिध्वनि प्राणगत अनिवार सत्याघात की-'नर का बहाया रक्त, हे भगवान ! मैंने क्या कियालेकिन, मनुज के प्राण, शायद, पत्थरों के हैं बने ।

इस दंश क दुख भूल करहोता समर-आरूढ फिर;फिर मारता, मरता,विजय पाकर बहाता अश्रु है ।

यों ही, बहुत पहले कभी कुरुभूमि मेंनर-मेध की लीला हुई जब पूर्ण थी,पीकर लहू जब आदमी के वक्ष कावज्रांग पाण्डव भीम क मन हो चुका परिशान्त था ।

और जब व्रत-मुक्त-केशी द्रौपदी,मानवी अथवा ज्वलित, जाग्रत शिखा प्रतिशोध कीदाँत अपने पीस अन्तिम क्रोध से,रक्त-वेणी कर चुकी थी केश की,केश जो तेरह बरस से थे खुले ।

और जब पविकाय पाण्डव भीम नेद्रोण-सुत के सीस की मणि छीन करहाथ में रख दी प्रिया के मग्न होपाँच नन्हें बालकों के मुल्य-सी ।

कौरवों का श्राद्ध करने के लिएया कि रोने को चिता के सामने,शेष जब था रह गया कोई नहींएक वृद्धा, एक अन्धे के सिवा ।

और जब,तीव्र हर्ष-निनाद उठ कर पाण्डवों के शिविर सेघूमता फिरता गहन कुरुक्षेत्र की मृतभूमि में,लड़खड़ाता-सा हवा पर एक स्वर निस्सार-सा,लौट आता था भटक कर पाण्डवों के पास ही,जीवितों के कान पर मरता हुआ,और उन पर व्यंग्य-सा करता हुआ-'देख लो, बाहर महा सुनसान हैसालता जिनका हृदय मैं, लोग वे सब जा चुके।'

हर्ष के स्वर में छिपा जो व्यंग्य है,कौन सुन समझे उसे ? सब लोग तोअर्द्ध-मृत-से हो रहे आनन्द से;जय-सुरा की सनसनी से चेतना निस्पन्द है ।

किन्तु, इस उल्लास-जड़ समुदाय मेंएक ऐसा भी पुरुष है, जो विकलबोलता कुछ भी नहीं, पर, रो रहामग्न चिन्तालीन अपने-आप में ।

"सत्य ही तो, जा चुके सब लोग हैंदूर ईष्या-द्वेष, हाहाकार से !मर गये जो, वे नहीं सुनते इसे;हर्ष क स्वर जीवितों का व्यंग्य है।"

स्वप्न-सा देखा, सुयोधन कह रहा-"ओ युधिष्ठिर, सिन्धु के हम पार हैं;तुम चिढाने के लिए जो कुछ कहो,किन्तु, कोई बात हम सुनते नहीं ।

"हम वहाँ पर हैं, महाभारत जहाँदीखता है स्वप्न अन्तःशून्य-सा,जो घटित-सा तो कभी लगता, मगर,अर्थ जिसका अब न कोई याद है ।

"आ गये हम पार, तुम उस पार हो;यह पराजय या कि जय किसकी हुई ?व्यंग्य, पश्चाताप, अन्तर्दाह काअब विजय-उपहार भोगो चैन से।"

हर्ष का स्वर घूमता निस्सार-सालड़खड़ाता मर रहा कुरुक्षेत्र में,औ' युधिष्ठिर सुन रहे अव्यक्त-साएक रव मन का कि व्यापक शून्य का ।

'रक्त से सिंच कर समर की मेदिनीहो गयी है लाल नीचे कोस-भर,और ऊपर रक्त की खर धार मेंतैरते हैं अंग रथ, गज, बाजि के ।

'किन्तु, इस विध्वंस के उपरान्त भीशेष क्या है ? व्यंग ही तो भग्य का ?चाहता था प्राप्त मैं करना जिसेतत्व वह करगत हुआ या उड़ गया ?

'सत्य ही तो, मुष्टिगत करना जिसेचाहता था, शत्रुओं के साथ हीउड़ गये वे तत्त्व, मेरे हाथ मेंव्यंग्य, पश्चाताप केवल छोड़कर ।

'यह महाभारत वृथा, निष्फल हुआ,उफ ! ज्वलित कितना गरलमय व्यंग है ?पाँच ही असहिष्णु नर के द्वेष सेहो गया संहार पूरे देश का !

'द्रौपदी हो दिव्य-वस्त्रालंकृता,और हम भोगें अहम्मय राज्य यह,पुत्र-पति-हीना इसी से तो हुईंकोटि माताएँ, करोड़ों नारियाँ !

'रक्त से छाने हुए इस राज्य कोवज्र हो कैसे सकूँगा भोग मैं ?आदमी के खून में यह है सना,और इसमें है लहू अभिमन्यु का' ।

वज्र-सा कुछ टूटकर स्मृति से गिरा,दब गये कौन्तेय दुर्वह भार में ।दब गयी वह बुद्धि जो अब तक रहीखोजती कुछ तत्त्व रण के भस्म में ।

भर गया ऐसा हृदय दुख-दर्द-से,फेन य बुदबुद नहीं उसमें उठा !खींचकर उच्छ्वास बोले सिर्फ वे'पार्थ, मैं जाता पितामह पास हूँ।'

और हर्ष-निनाद अन्तःशून्य-सालड़खड़ता मर रहा था वायु में ।

Commentary

‘कुरुक्षेत्र’ रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की प्रसिद्ध प्रबंध-काव्य रचना है। इसमें महाभारत के युद्ध को आधार बनाकर युद्ध, शांति, धर्म, न्याय, हिंसा और मानवता जैसे गंभीर प्रश्नों पर विचार किया गया है। दिनकर ने महाभारत के शांतिपर्व की पृष्ठभूमि में विशेष रूप से युधिष्ठिर और भीष्म के संवाद को आधार बनाया है। युद्ध समाप्त हो चुका है और उसके विनाशकारी परिणाम सामने हैं। इसी संदर्भ में युद्ध की आवश्यकता और उसकी नैतिकता पर प्रश्न उठते हैं।

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MLA 9 Ramdhari Singh "Dinkar". “कुरूक्षेत्र – प्रथम सर्ग.” Mansarovar Sahitya, https://www.mansarovarsahitya.in/poems/%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a5%e0%a4%ae-%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/. Accessed 12 Oct. 2026.
Chicago 17 Ramdhari Singh "Dinkar". “कुरूक्षेत्र – प्रथम सर्ग.” Mansarovar Sahitya. Accessed October 12, 2026. https://www.mansarovarsahitya.in/poems/%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a5%e0%a4%ae-%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/.
Reference रामधारी सिंह ‘दिनकर’। «कुरूक्षेत्र – प्रथम सर्ग»। Mansarovar Sahitya, https://www.mansarovarsahitya.in/poems/%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a5%e0%a4%ae-%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/।

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