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प्रबंध-काव्य

कुरुक्षेत्र – पंचम सर्ग

वीर रस, करुण रस

शारदे! विकल संक्रांति-काल का नर मैं,कलिकाल-भाल पर चढ़ा हुआ द्वापर मैं;संतप्त विश्व के लिए खोजते छाया,आशा में था इतिहास-लोक तक आया ।

पर हाय, यहाँ भी धधक रहा अंबर है,उड़ रही पवन में दाहक लोल लहर है;कोलाहल-सा आ रहा काल-गह्वर से,तांडव का रोर कराल क्षुब्ध सागर से ।

संघर्ष-नाद वन-दहन-दारू का भारी,विस्फोट वह्नि-गिरि का ज्वलंत भयकारी;इन पन्नों से आ रहा विस्र यह क्या है ?जल रहा कौन ? किसका यह विकत धुआँ है ?

भयभीत भूमि के उरमें चुभी शलाका,उड़ रही लाल यह किसकी विजय-पताका ?है नाच रहा वह कौन ध्वंस-असिधारे,रुधिराक्त-गात, जिह्वा लेलिहम्य पसारे ?

यह लगा दौड़ने अश्व कि मद मानव का ?हो रहा यज्ञ या ध्वंस अकारण भव का ?घट में जिसको कर रहा खड्ड संचित है,वह सरिद्वारि है या नर का शोणित है ?

मंडली नृपों की जिन्हें विवश हो ढोती,यज्ञोपहार हैं या कि मान के मोती ?कुंडों में यह घृत-वलित हव्य बलता है ?या अहंकार अपहृत नृप का जलता है ?

ऋत्विक पढ़ते हैं वेद कि, ऋचा दहन की ?प्रशमित करते या ज्वलित वह्नि जीवन की ?है कपिश धूम प्रतिगान जयी के यश का ?या धुँधुआता है क्रोध महीप विवश का ?

यह स्वस्ति-पाठ है या नव अनल-प्रदाहन ?यज्ञान्त-स्नान है या कि रुधिर-अवगाहन ?सम्राट-भाल पर चढ़ी लाल जो टीका,चन्दन है या लोहित प्रतिशोध किसी का ?

चल रही खड्ड के साथ कलम भी कवि की,लिखती प्रशस्ति उन्माद, हुताशन पवि की ।जय-घोष किए लौटा विद्वेष समर सेशारदे! एक दूतिका तुम्हारे घर से-

दौड़ी नीराजन-थाल लिए निज कर में,पढ़ती स्वागत के श्लोक मनोरम स्वर में ।आरती सजा फिर लगी नाचने-गाने,संहार-देवता पर प्रसून छितराने ।

अंचल से पोंछ शरीर, रक्त-माल धो करअपरूप रूप से बहुविध रूप सँजो कर,छवि को संवार कर बैठा लिया प्राणों मेंकर दिया शौर्य कह अमर उसे गानों में ।

हो गया क्षार, जो द्वेष समर में हाराजो जीत गया, वो पूज्य हुआ अंगारा ।सच है, जय से जब रूप बदल सकता है,वध का कलंक मस्तक से टल सकता है-

तब कौन ग्लानि के साथ विजय को तोले,दृग-श्रवण मूंद कर अपना हृदय टटोले ?सोचे कि एक नर की हत्या यदि अघ है,तब वध अनेक का कैसे कृत्य अनघ है ?

रण-रहित काल में वह किससे डरता है ?हो अभय क्यों न जिस-तिस का वध करता है ?जाता क्यों सीमा भूल समर में आ कर ?नर-वध करता अधिकार कहाँ से पा कर ?

इस काल–गर्भ में किन्तु, एक नर ज्ञानीहै खड़ा कहीं पर भरे दृगों में पानी,रक्ताक्त दर्प को पैरों तले दबाये,मन में करुणा का स्निग्ध प्रदीप जलाए ।

सामने प्रतीक्षा–निरत जयश्री बालासहमी सकुची है खड़ी लिए वरमाला ।पर, धर्मराज कुछ जान नहीं पाते हैं,इस रूपसी को पहचान नहीं पाते हैं ।

कौंतेय भूमि पर खड़े मात्र हैं तन से,हैं चढ़े हुये अपरूप लोक में मन से ।वह लोक, जहां विद्वेष पिघल जाता हैकर्कश, कठोर कालायस गल जाता है;

नर जहां राग से होकर रहित विचरता,मानव, मानव से नहीं परस्पर डरता;विश्वास–शांति का निर्भय राज्य जहां है,भावना स्वार्थ की कलुषित त्याज्य जहां है ।

जन–जन के मन पर करुणा का शासन हैअंकुश सनेह का, नय का अनुशासन है ।है जहां रुधिर से श्रेष्ठ अश्रु निज पीना,साम्राज्य छोड़ कर भीख मांगते जीना ।

वह लोक जहां शोणित का ताप नहीं है,नर के सिर पर रण का अभिशाप नहीं है ।जीवन समता की छांह–तले पलटा है,घर–घर पीयूष–प्रदीप जहां जलता है ।

अयि विजय! रुधिर से क्लिन्न वासन है तेरा,यम दृष्टा से क्या भिन्न दशन है तेरा ?लपटों की झालर झलक रही अंचल में,है धुआं ध्वंस का भरा कृष्ण कुंतल में ।

ओ कुरुक्षेत्र की सर्व-ग्रासिनी व्याली,मुख पर से तो ले पोंछ रुधिर की लाली ।तू जिसे वरण करने के हेतु विकल है,वह खोज रहा कुछ और सुधामय फल है ।

वह देख वहाँ, ऊपर अनंत अंबर में,जा रहा दूर उड़ता वह किसी लहर मेंलाने धरणी के लिए सुधा की सरिता,समता प्रवाहिनी, शुभ्र स्नेह–जल–भरिता ।

सच्छान्ति जागेगी इसी स्वप्न के क्रम से,होगा जग कभी विमुक्त इसी विध यम से ।परिताप दीप्त होगा विजयी के मन में,उमड़ेंगे जब करुणा के मेघ नयन में;

जिस दिन वध को वध समझ जयी रोएगाआँसू से तन का रुधिर–पंक धोएगा;होगा पथ उस दिन मुक्त मनुज की जय काआरम्भ भीत धरणी के भाग्योदय का ।

संहार सुते! मदमत्त जयश्री वाले !है खड़ी पास तू किसके वरमाला ले ?हो चुका विदा तलवार उठाने वाला,यह है कोई साम्राज्य लुटाने वाला ।

रक्ताक्त देह से इसको पा न सकेगीयोगी को मद–शर मार जगा न सकेगी ।होगा न अभी इसके कर में कर तेरा,यह तपोभूमि, पीछे छूटा घर तेरा ।

लौटेगा जब तक यह आकाश–प्रवासी,आएगा तज निर्वेद –भूमि सन्यासी,मद–जनित रंग तेरे न ठहर पाएंगेतब तक माला के फूल सूख जाएँगे ।

बुद्धि बिलखते उर का चाहे जितना करे प्रबोध,सहज नहीं छोड़ती प्रकृति लेना अपना प्रतिशोध ।

चुप हो जाए भले मनुज का हृदय युक्ति से हार,रुक सकता पर, नहीं वेदना का निर्मम व्यापार ।

सम्मुख जो कुछ बिछा हुआ है,निर्जन, ध्वस्त,विषण्ण,युक्ति करेगी उसे कहाँ तक आँखों से प्रच्छ्न्न ?

चलती रही पितामह-मुख से कथा अजस्र,अमेय,सुनते ही सुनते, आँसू में फूट पड़े कौंतेय ।

हाँ, सब हो चुका पितामह, रहा नहीं कुछ शेष,शेष एक आँखों के आगे है यह मृत्यु-प्रदेश-

जहां भयंकर भीमकाय शव-सा निस्पंद, प्रशांत,शिथिल श्रांत हो लेट गया है स्वयं काल विक्रांत ।

रुधिर-सिक्त-अंचल में नर के खंडित लिए शरीर,मृतवत्सला विषण्ण पड़ी है धरा मौन, गंभीर ।

सड़ती हुई विषाक्त गंध से दम घुटता सा जान,दबा नासिका निकाल भागता है द्रुतगति पवमान ।

सीत-सूर्य अवसन्न डालता सहम-सहम कर ताप,जाता है मुंह छिपा घनों में चाँद चला चुपचाप ।

वायस, गृद्ध, शृगाल, स्वान, दल के दलवन-मार्जार,यम के अतिथि विचरते सुख से देख विपुलआहार ।

मनु का पुत्र बने पशु-भोजन! मानव का यह अंत !भरत-भूमि के नर वीरों की यह दुर्गति, हा, हंत !

तन के दोनों ओर झूलते थे जो शुंड विशाल,कभी प्रिया का कंठहार बन, कभी शत्रु का काल-

गरुड-देव के पुष्ट पक्ष-निभ दुर्दमनीय, महान,अभय नोचते आज उन्हीं को वन के जम्बुक, श्वान ।

जिस मस्तक को चंचु मार कर वायस रहे विदार,उन्नति-कोश जगत का था वह, स्यात,स्वप्न-भांडार ।

नोच नोच खा रहा गृद्ध जो वक्ष किसी का चीर,किसी सुकवि का, स्यात, हृदय था स्नेह सिक्त गंभीर ।

केवल गणना ही नर की कर गया न कम विध्वंस,लूट ले गया है वह कितने ही अलभ्य अवतंस ।

नर वरेण्य, निर्भीक, शूरता के ज्वलंत आगार,कला, ज्ञान, विज्ञान, धर्म के मूर्तिमान आधार-

रण की भेंट चढ़े सब; हृतरत्ना वसुंधरा दीन,कुरुक्षेत्र से निकली है होकर अतीव श्रीहीन ।

विभव, तेज, सौंदर्य, गए सब दुर्योधन के साथ,एक शुष्क कंकाल लगा है मुझ पापी के हाथ ।

एक शुष्क कंकाल, मृतों के स्मृति-दंशन का शाप,एक शुष्क कंकाल, जीवितों के मन का संताप ।

एक शुष्क कंकाल, युधिष्ठिर की जय की पहचान,एक शुष्क कंकाल, महाभारत का अनुपम दान ।

धरती वह, जिस पर कराहता है घायाल संसार,वह आकाश, भरा है जिसमें करुणा की चीत्कार ।

महादेश वहजहां सिद्धि की शेष बची है धूल,जलकर जिसके क्षार हो गए हैं समृद्धि के फूल ।

यह उच्छिष्ट प्रलय का, अहि-दंशित मुमूर्ष यह देश,मेरे हित श्री के गृह में, वरदान यही था शेष ।

सब शूर सुयोधन-साथ गएमृतकों से भरा यह देश बचा है;मृत वत्सला माँ की पुकार बची,युवती विधवाओं का वेश बचा है;सुख-शांति गयी, रस राग गया,करुणा, दुख-दैन्य अशेष बचा है;विजयी के लिए यह भाग्य के हाथ मेंक्षार समृद्धि का शेष बचा है ।

रण शांत हुआ,पर हाय, अभी भीधारा अवसन्न, दरी हुई है;नर-नारियों के मुख देश पे नाश कीछाया सी एक पड़ी हुई है;धरती, नभ, दोनों विषण्ण उदासीगंभीर दिशा मेंभरी हुई है;कुछ जान नहीं पड़ता, धरणि यहजीवित है कि मरी हुई है ।

यह घोर मसान पितामह! देखियेप्रेत समृद्धि के आ रहे वे;जय-माला पिन्हा कुरुराज को घेरप्रशस्ति के गीत सुना रहे वे;मुरदों के कटे-फटे गात को इंगितसे मुझको दिखला रहे वे;सुनिए ये व्यंग निनाद हंसी काठठा मुझको ही चिढ़ा रहे वे ।

कहते हैं, युधिष्ठिर, बातें बड़ी बड़ीसाधुता की तू किया करता था;उपदेश सभी को सदा तप, त्यागक्षमा, करुणा का दिया करता था;अपना दुख-भाग पराये के दुख सेदौड़ के बाँट लिया करता था;धन-धाम गंवा कर धर्म हेतुवनों में जा वास किया करता था ।

वह था सच या उसका छल-पूर्णविराग, न प्राप्त जिसे बल था;जन में करुणा को जगा निज कृत्य सेजो निज जोड़ रहा दल था;थी सहिष्णुता या तुझमें प्रतिशोध कादीपक गुप्त रहा जल था ?वह धर्म था या कि कदर्यता कोढकने के निमित्त मृषा छल था ?

जन का मन हाथ में आया जभी,नर-नायक पक्ष में आने लगेकरुणा तज जाने लगी तुझकोप्रतिकार के भाव सताने लगे;तप-त्याग विभूषण फेंक के पांडवसत्य स्वरूप दिखाने लगे;मंडराने विनाश लगा नभ मेंघन युद्ध के आ गहराने लगे ।

अपने दुख और सुयोधन के सुखक्या न सदा तुझको खलते थे ?कुरुराज का देख प्रताप बता, सचप्राण क्या तेरे नहीं जलते थे ?तप से ढँक किन्तु, दुरग्नि को पांडवसाधू बने जग को छलते थे,मन में थी प्रचंड शिखा प्रतिशोध कीबाहर वे कर को मलते थे ।

जब युद्ध में फूट पड़ी यह आग, तोकौन सा पाप नहीं किया तूने ?गुरु के वध के हित झूठ कहासिर काट समाधि में ही लिया तूने;छल से कुरुराज की जांघ को तोड़नया रण धर्म चला दिया तूनेअरे पापी, मुमुर्ष मनुष्य के वक्ष कोचीर सहास लहू पिया तू ने ।

अपकर्म किए जिसके हित, अंक मेंआज उसे भरता नहीं क्यों है ?ठुकराता है जीत को क्यों पद से ?अब द्रोपदी से डरतानहीं क्यों है ?कुरुराज की भोगी हुई इस सिद्धि कोहर्षित हो वरता नहीं क्यों है ?कुरुक्षेत्र-विजेता, बता, निज पाँवसिंहासन पै धरता नहीं क्यों है ?

अब बाधा कहाँ? निज भाल पै पांडवराज-किरीट धरें सुख से;डर छोड़ सुयोधन का जग मेंसिर ऊंचा किए विहरें सुख से;जितना सुख चाहें, मिलेगा उन्हेंधन-धान्य से धाम भरें सुख से;अब वीर कहाँ जो विरोध करे ?विधवाओं पै राज करें सुख से ।

सच ही तो पितामह, वीर-वधूवसुधा विधवा बन रो रही है;कर-कंकड़ को कर चूर ललाट सेचिह्न सुहाग का धो रही है;यह देखिये जीत की घोर अनीति,प्रमत्त पिशाचिनी हो रही है;इस दु:खिता के संग ब्याह का साजसमीप चिता के सँजो रही है ।

इस रोती हुई विधवा को उठाकिस भांति गले से लगाऊँगा मैं ?जिसके पति की न चिता है बुझीनिज अंक में कैसे बिठाऊंगा मैं ?धन में अनुरक्ति दिखा अवशिष्टस्वकीर्ति को भी न गवाऊंगा मैं ।लड़ने का कलंक लगा सो लगाअब और इसे न बढ़ाऊंगा मैं ।

धन ही परिणाम है युद्ध का अंतिमतात, इसे यदि जानता मैं;वनवास में जो अपने में छिपीइस वासना को पहचानता मैं,द्रौपदी की तो बात क्या? कृष्ण का भीउपदेश नहीं टुक मानता मैं,फिर से कहता हूँ पितामह, तोयह युद्ध कभी नहीं ठानता मैं ।

पर हाय, थी मोहमयी रजनी वह,आज का दिव्य प्रभात न था;भ्रम की थी कुहा तम-तोम-भरीतब ज्ञान खिला अवदात न था;धन-लोभ उभारता था मुझको,वह केवल क्रोध का घात न था;सबसे था प्रचंड जो सत्य पितामह,हाय, वही मुझे ज्ञात न था ।

जब सैन्य चला, मुझमें न जगायह भाव कि मैं कहाँ जा रहा हूँ;किस तत्व का मूल्य चुकाने को देश केनाश को पास बुला रहा हूँ;कुरु-कोष है या कच द्रौपदी काजिससे रण-प्रेरणा पा रहा हूँअपमान को धोने चला अथवासुख भोगने को ललचा रहा हूँ ।

अपमान का शोध मृषा मिस था,सच में, हम चाहते थे सुख पाना,फिर एक सुदिव्य सभागृह कोरचवा कुरुराज के जी को जलाना,निज लोलुपता को सदा नर चाहतादर्प की ज्योति के बीच छिपाना,लड़ता वह लोभ से, किन्तु, कियाकरता प्रतिशोध का झूठ बहाना ।

प्रतिकार था ध्येय, तो पूर्ण हुआ,अब चाहिए क्या परितोष हमें ?कुरु-पक्ष के तीन रथी जो बचे,उनके हित शेष न रोष हमें;यह माना, प्रचारित हो अरी सेलड़ने नहीं कुछ दोष हमें;पर, क्या अघ-बीच न देगा डुबोकुरु का यह वैभव-कोष हमें ?

सब लोग कहेंगे, युधिष्ठिर दंभ सेसाधुता का व्रतधारी हुआ;अपकर्म में लीन हुआ, जब क्लेशउसे तप त्याग का भारी हुआ;नरमेध में प्रस्तुत तुच्छ सुखों कोनिमित्त महा अभिचारी हुआकरुणा-व्रत पालन में असमर्थ होरौरव का अधिकारी हुआ ।

कुछ के अपमान के साथ पितामह,विश्व-विनाशक युद्ध को तोलिए;इनमें से विघातक पातक कौनबड़ा है? रहस्य विचार को खोलिए;मुझ दीन, विपणन को देख, दयार्द्र होदेव! नहीं निज सत्य से डोलिए;नर-नाश का दायी था कौन ? सुयोधनया कि युधिष्ठिर का दल ? बोलिए ।

हठ पै दृढ़ देख सुयोधन कोमुझको व्रत से डिग जाना था क्या ?विष की जिस कीच में था वह मग्नमुझे उसमें गिर जाना था क्या ?वह खड्ड लिए था खड़ा, इससेमुझको भी कृपाण उठाना था क्या ?द्रौपदी के पराभव का बदलाकर देश का नाश चुकाना था क्या ?

मिट जाये समस्त महीतल, क्योंकिकिसी ने किया अपमान किसी का;जगती जल जाये कि छूट रहा हैकिसी का दाहक वाण किसी का;सबके अभिमान उठें बल, क्योंकिलगा बलने अभिमान किसी का;नर हो बली के पशु दौड़ पड़ेंकि उठा बज युद्ध-विषाण किसी का ।

कहिए मत दीप्ति इसे बल की,यह दारद है, रण का ज्वर है;यह दानवता की शिखा है मनुष्य मेंराग की आग भयंकर है;यह बुद्धि-प्रमाद है, भ्रांति में सत्य कोदेख नहीं सकता नर है;कुरुवंश में आग लगी, तो उसेदिखता जलता अपना घर है ।

दुनिया तज देती न क्यों उसको,लड़ने लगते जब दो अभिमानी ?मिटने दे उन्हें जग, आपस मेंजिन लोगों ने है मिटने की ही ठानी;कुछ सोचे-विचारे बिना रण मेंनिज रक्त बहा सकता नर दानी;पर, हाय, तटस्थ हो डाल नहींसकता वह युद्ध की आग में पानी ।

कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हुआ; हमसात हैं; कौरव तीन बचे हैं;सब लोग मरे; कुछ पंगु, व्रणी,विकलांग, विवर्ण, निहीन बचे हैं;कुछ भी न किसी को मिला, सब हीकुछ खो कर, हो कुछ दीन बचे हैं;बस, एक है पांडव जो कुरुवंश काराज-सिंहासन छीन बचे हैं ।

यह राज-सिंहासन ही जड़ थाइस युद्ध की, मैं अब जानता हूँ,द्रौपदी कचमें थी जो लोभ की नागिनीआज उसे पहचानता हूँ;मन के दृग की शुभ ज्योति हरीइस लोभ ने ही, यह मानता हूँ;यह जीता रहा, तो विजेता कहाँ मैं ?अभी रण दूसरा ठानता हूँ ।

यह होगा महा रण राग के साथ,युधिष्ठिर हो विजयी निकलेगा;नर-संस्कृति की रण छिन्न लता परशांति-सुधा-फल दिव्य फलेगा,कुरुक्षेत्र की धूल नहीं इति पंथ कीमानव ऊपर और चलेगामनु का यह पुत्र निराश नहींनव धर्म-प्रदीप अवश्य जलेगा !

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MLA 9 Ramdhari Singh "Dinkar". “कुरुक्षेत्र – पंचम सर्ग.” Mansarovar Sahitya, https://www.mansarovarsahitya.in/poems/%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%ae-%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/. Accessed 8 Aug. 2026.
Chicago 17 Ramdhari Singh "Dinkar". “कुरुक्षेत्र – पंचम सर्ग.” Mansarovar Sahitya. Accessed August 8, 2026. https://www.mansarovarsahitya.in/poems/%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%ae-%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/.
Reference रामधारी सिंह ‘दिनकर’। «कुरुक्षेत्र – पंचम सर्ग»। Mansarovar Sahitya, https://www.mansarovarsahitya.in/poems/%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%ae-%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/।
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