କବିତା ଓ ରଚନା
कुरूक्षेत्र – द्वितीय सर्ग
कुरूक्षेत्र – प्रथम सर्ग
अति सूधो सनेह को मारग है
प्रेम का रास्ता सीधा है — इतना सीधा कि उसमें चतुराई की कोई गुंजाइश नहीं। रीति-परम्परा के बीच खड़ी एक रीति-मुक्त घोषणा।
बिहारी सतसई — चुने हुए दोहे
बिहारी के दोहे में जितना कहा जाता है, उससे अधिक संकेत में छूटता है — यही उनकी «नाविक के तीर» वाली मार…
वृक्षवल्ली आम्हा सोयरी
पेड़-लताएँ ही सगे-सम्बन्धी हैं, पक्षी ही स्वजन — तुकाराम का सबसे गाया जाने वाला अभंग, जिसमें एकान्त कोई त्याग नहीं, एक सुख…
मानुष हौं तो वही रसखानि
अगला जन्म किसी भी योनि में हो — कवि की शर्त एक ही है कि वह ब्रज में हो। रसखान का सबसे…
रहीम के दोहे
रहीम का नीति-बोध चित्रों में चलता है — टूटा धागा, मोतियों की माला, सुई और तलवार। उपदेश कहीं नहीं, दृष्टान्त हर जगह।
हनुमान चालीसा — आरम्भ
उत्तर भारत की सबसे अधिक कण्ठस्थ रचना। आरम्भ के दो दोहे कवि की विनय हैं, और उसके बाद चालीस चौपाइयाँ आरम्भ होती…
रामचरितमानस — मंगलाचरण
मानस की पहली चौपाइयाँ गुरु के चरण-रज को औषधि कहती हैं — और उसी क्रम से पूरी कथा आरम्भ होती है।
मेरे तो गिरधर गोपाल
घर, कुल और लोक-लाज छोड़ने का घोषणा-पत्र। पद की टेक ही उसका तर्क है — दूसरा कोई नहीं।
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