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प्रबंध-काव्य

कुरुक्षेत्र – चतुर्थ सर्ग

वीर रस, करुण रस

ब्रह्मचर्य के व्रतीधर्म केमहास्तंभ, बल के आगारपरम विरागी पुरुष जिन्हेंपाकर भी पा न सका संसार ।

किया विसर्जित मुकुट धर्म हितऔर स्नेह के कारण प्राणपुरुष विक्रमी कौन दूसराहुआ जगत में भीष्म सामान ?

शरों की नोक पर लेटे हुए,गजराज जैसेथके, टूटे गरुड़ से,स्रस्त पन्न्गराज जैसेमरण पर वीर-जीवन का अगम बल भार डालेदबाये काल को, सायास संज्ञा को संभाले,

पितामह कह रहे कौन्तेय से रण की कथा हैं,विचारों की लड़ी में गूंथते जाते व्यथा हैं।ह्रदय सागर मथित होकर कभी जब डोलता हैछिपी निज वेदना गंभीर नर भी बोलता है ।

"चुराता न्याय जो, रण को बुलाता भी वही है,युधिष्ठिर ! स्वत्व की अन्वेषणा पातक नहीं है ।नरक उनके लिए, जो पाप को स्वीकारते हैं;न उनके हेतु जो तन में उसे ललकारते हैं ।

सहज ही चाहता कोई नहीं लड़ना किसी से;किसीको मारना अथवा स्वयं मरना किसी से;नहीं दु:शांति को भी तोडना नर चाहता है;जहाँ तक हो सके, निज शांति प्रेम निबाहता है ।

मगर, यह शांतिप्रियता रोकती केवल मनुज कोनहीं वो रोक पाती है दुराचारी दनुज को ।दनुज क्या शिष्ट मानव को कभी पहचानता है ?विनय की नीति कायर की सदा वह मानता है ।

समय ज्यों बीतता, त्यों त्यों अवस्था घोर होती हैअन्य की श्रंखला बढ़ कर कराल कठोर होती है ।किसी दिन तब, महाविस्फोट कोई फूटता हैमनुज ले जान हाथों में दनुज पर टूटता है ।

न समझोकिन्तु, इस विध्वंस के होते प्रणेतासमर के अग्रणी दो ही, पराजित और जेता ।नहीं जलता निखिलसंसार दो की आग से है,अवस्थित ज्यों न जग दो-चार ही के भाग से है ।

युधिष्ठिर ! क्या हुताशन-शैल सहसा फूटता है ?कभी क्या वज्र निर्धन व्योम से भी छूटता है ?अनलगिरी फूटता, जब ताप होता है अवनी में,कडकती दामिनी विकराल धूमाकुल गगन में ।

महाभारत नहीं था द्वन्द्व केवल दो घरों का,अनल का पुंज था इसमें भरा अगणित नरों का ।न केवल यह कुफल कुरुवंश के संघर्ष का था,विकट विस्फोट यह सम्पूर्ण भारतवर्ष का था ।

युगों से विश्व में विष-वायु बहती आ रही थी,धरित्री मौन हो दावाग्नि सहती आ रही थी;परस्पर वैर-शोधन के लिए तैयार थे सब,समर का खोजते कोई बड़ा आधार थे सब ।

कहीं था जल रहा कोई किसी की शूरता से ।कहीं था क्षोभ में कोई किसी की क्रूरता से ।कहीं उत्कर्ष ही नृप का नृपों को सालता थाकहीं प्रतिशोध का कोई भुजंगम पालता था ।

निभाना पर्थ-वध का चाहता राधेयथा प्रण ।द्रुपद था चाहता गुरु द्रोण से निज वैर-शोधन ।शकुनी को चाह थी, कैसे चुकाए ऋण पिता का,मिला दे धूल में किस भांति कुरु-कुल की पताका ।

सुयोधन पर न उसका प्रेम था, वह घोर छल था ।हितू बन कर उसे रखना ज्वलित केवल अनल था ।जहाँ भी आग थी जैसी, सुलगती जा रही थी,समर में फूट पड़ने के लिए अकुला रही थी ।

सुधारों से स्वयं भगवान के जो-जो चिढे थेनृपति वे क्रुद्ध होकर एक दल में जा मिले थे ।नहीं शिशुपाल के वध से मिटा था मान उनका,दुबक कर था रहा धुन्धुंआँ द्विगुण अभिमान उनका ।

परस्पर की कलह से, वैर से, हो कर विभाजितकभी से दो दलों में हो रहे थे लोग सज्जित ।खड़े थे वे ह्रदय में प्रज्वलित अंगार ले कर,धनुर्ज्या को चढा कर, म्यान में तलवार ले कर ।

था रह गया हलाहल का यदिकोई रूप अधूरा,किया युधिष्ठिर, उसे तुम्हारेराजसूय ने पूरा ।

इच्छा नर की और, और फलदेती उसे नियति है ।फलता विष पीयूष-वृक्ष में,अकथ प्रकृति की गति है ।

तुम्हें बना सम्राट देश का,राजसूय के द्वारा,केशव ने था ऐक्य- सृजन काउचित उपाय विचारा ।

सो, परिणाम और कुछ निकला,भडकी आग भुवन में ।द्वेष अंकुरित हुआ पराजितराजाओं के मन में ।

समझ न पाए वे केशव केसदुद्देश्य निश्छल को ।देखा मात्र उन्होंने बढ़तेइन्द्रप्रस्थ के बल को ।

पूजनीय को पूज्य माननेमें जो बाधा-क्रम है,वही मनुज का अहंकार है,वही मनुज का भ्रम है ।

इन्द्रप्रस्थ का मुकुट-छत्रभारत भर का भूषण था;उसे नमन करने में लगताकिसे, कौन दूषण था ?

तो भी ग्लानि हुई बहुतों कोइस अकलंक नमन से,भ्रमित बुद्धि ने की इसकीसमता अभिमान-दलन से ।

इस पूजन में पड़ी दिखाईउन्हें विवशता अपनी,पर के विभव, प्रताप, समुन्नतिमें परवशता अपनी ।

राजसूय का यज्ञ लगाउनको रण के कौशल सा,निज विस्तार चाहने वालेचतुर भूप के छल सा ।

धर्मराज ! कोई न चाहताअहंकार निज खोनाकिसी उच्च सत्ता के सम्मुखसन्मन से नत होना ।

सभी तुम्हारे ध्वज के नीचेआये थे न प्रणय सेकुछ आये थे भक्ति-भाव सेकुछ कृपाण के भय से ।

मगर भाव जो भी हों सबकेएक बात थी मन मेंरह सकता था अक्षुण्ण मुकुट कामान न इस वंदन में ।

लगा उन्हें, सर पर सबकेदासत्व चढा जाता है,राजसूय में से कोईसाम्राज्य बढ़ा आता है ।

किया यज्ञ ने मान विमर्दितअगणित भूपालों का,अमित दिग्गजों का,शूरों का,बल वैभव वालों का ।

सच है सत्कृत किया अतिथिभूपों को तुमने मन सेअनुनय, विनय, शील, समता से,मंजुल, मिष्ट वचन से ।

पर, स्वतंत्रता-मणि का इनसेमोल न चूक सकता हैमन में सतत दहकने वालाभाव न रुक सकता है ।

कोई मंद, मूढमति नृप हीहोता तुष्टवचन से,विजयी की शिष्टता-विनय से,अरि के आलिंगन से ।

चतुर भूप तन से मिल करतेशमित शत्रु के भय को,किन्तु नहीं पड़ने देतेअरि-कर में कभी ह्रदय को ।

हुए न प्रशमित भूपप्रणय-उपहार यज्ञ में देकर,लौटे इन्द्रप्रस्थ से वेकुछ भाव और ही ले कर ।

"धर्मराज, है याद व्यास कावह गंभीर वचन क्या ?ऋषि का वह यज्ञान्त-काल काविकट भविष्य-कथन क्या ?

जुटा जा रहा कुटिल ग्रहों कादुष्ट योग अम्बर में,स्यात जगत पडने वाला हैकिसी महा संगरमें ।

तेरह वर्ष रहेगी जग मेंशांति किसी विध छायी ।तब होगा विस्फोट, छिडेगीकोई कठिन लड़ाई ।

होगा ध्वंस कराल, कालविप्लव का खेल रचेगा,प्रलय प्रकट होगा धरणी पर,हा-हा कार मचेगा ।

यह था वचन सिद्ध दृष्टा का,नहीं निरी अटकल थी,व्यास जानते थे वसुधाजा रही किधर पल-पल थी ।

सब थे सुखी यज्ञ से, केवलमुनि का ह्रदय विकल था,वहीजानते थे कि कुण्ड सेनिकला कौन अनल था ।

भरी सभा के बीच उन्होंनेसजग किया था सबको,पग-पग पर संयम का शुभउपदेश दिया था सबको ।

किन्तु अहम्म्य, राग-दीप्त नरकब संयम करता है ?कल आने वाली विपत्ति सेआज कहाँ डरता है ?

बीत न पाया वर्ष काल कागर्जन पड़ा सुनाई,इन्द्रप्रस्थ पर घुमड़ विपद कीघटा अतर्कित छायी ।

किसे ज्ञात था खेल-खेल मेंयह विनाश छायेगा ?भारत का दुर्भाग्य द्यूत परचढा हुआ आएगा ?

कौन जानता था कि सुयोधनकी धृति यों छूटेगी ?राजसूय के हवन-कुण्ड सेविकट- वह्नि फूटेगी ?

तो भी है सच, धर्मराज !यह ज्वाला नयी नहीं थी;दुर्योधन के मन में वहवर्षों से खेल रही थी ।

बिंधा चित्र-खग रंग भूमि मेंजिस दिन अर्जुन-शर से,उसी दिवस जनमी दुरग्निदुर्योधन के अन्तर से ।

बनी हलाहल वहीवंश का,लपटें लाख-भवन की,द्यूत-कपट शकुनी का वन-यातना पांडु-नंदन की ।

भरी सभा में लाज द्रोपदीकी न गयी थी लूटी,वह तो यही कराल आगथी निर्भय हो कर फूटी ।

ज्यों ज्यों साड़ी विवश द्रोपदीकी खिंचती जाती थी,त्यों–त्यों वह आवृत,दुरग्नि यह नग्न हुयी जाती थी ।

उसके कर्षित केश जाल मेंकेश खुले थे इसके,पुंजीभूत वसन उसका थावेश खुले थे इसके ।

दुरवस्था में घेर खड़ा थाउसे तपोबल उसका,एक दीप्त आलोक बन गयाथा चीरांचल उसका ।

पर, दुर्योधन की दुरग्निनंगी हो नाच रही थीअपनी निर्लज्जता, देश कापौरुष जांच रही थी ।

किन्तु न जाने क्यों उस दिनतुम हारे, मैं भी हारा,जाने, क्यों फूटी न भुजा कोफोड़ रक्त की धारा ।

नर की कीर्ति- ध्वजा उस दिनकट गयी देश में जड़ सेनारी ने सुर को टेरा,जिस दिन निराश हो नर से ।

महासमर आरम्भ देश मेंहोना था उस दिन ही,उठा खड्ग यह पंक रुधिर सेधोना था उस दिन ही ।

निर्दोषा, कुलवधू, एकवस्त्राको खींच महल से,दासी बना सभा में लायेदुष्ट द्यूत के छल से ।

और सभी के सम्मुखलज्जा-वसन अभय हो खोलेंबुद्धि- विषण्ण वीर भारत केकिन्तु नहीं कुछ बोलें ।

समझ सकेगा कौन धर्म कीयह नव रीति निराली,थूकेंगीं हम पर अवश्यसंततियां आने वाली ।

उस दिन की स्मृति से छातीअब भी जलने लगती है,भीतर कहीं छुरी कोईहृत पर चलने लगती है ।

धिक् धिक् मुझे, हुयी उत्पीड़ितसम्मुख राज-वधूटीआँखों के आगे अबला कीलाज खलों ने लूटी ।

और रहा जीवित मैं, धरणीफटी न दिग्गज डोला,गिरा न कोई वज्र, न अम्बरगरज क्रोध में बोला ।

जिया प्रज्ज्वलित अंगारे-सामैं आजीवन जग में,रुधिर नहीं था, आग पिघल करबहती थी रग-रग में ।

यह जन कभी किसी का अनुचितदर्प न सह सकता था,कहीं देख अन्याय किसी कामौन न रह सकता था ।

सो कलंक वह लगा, नहींधुल सकता जो धोने से,भीतर ही भीतर जलने सेया कष्ट फाड़ रोने से ।

अपने वीर चरित पर तो मैंप्रश्न लिए जाता हूँ,धर्मराज ! पर, तुम्हें एकउपदेश दिए जाता हूँ ।

शूरधर्म है अभय दहकतेअंगारों पर चलना,शूरधर्म है शाणित असि परधर कर चरण मचलना ।

शूरधर्म कहते हैं छाती तानतीर खाने को,शूरधर्म कहते हँस करहालाहल पी जाने को ।

आग हथेली पर सुलगा करसिर का हविष्चढाना,शूरधर्म है जग को अनुपमबलि का पाठ पढ़ाना ।

सबसे बड़ा धर्म है नर कासदा प्रज्वलित रहना,दाहक शक्ति समेट स्पर्श भीनहीं किसी का सहना ।

बुझा बुद्धि का दीप वीरवरआँख मूँद चलते हैं,उछल वेदिका पर चढ जातेऔर स्वयं बलते हैं ।

बात पूछने को विवेक सेजभी वीरता जाती,पी जाती अपमान पतित होअपना तेज गंवाती ।

सच है बुद्धि-कलश में जल हैशीतल सुधा तरल है,पर,भूलो मत, कुसमय मेंहो जाता वही गरल है ।

सदा नहीं मानापमान कीबुद्धि उचित सुधि लेती,करती बहुत विचार, अग्नि कीशिखा बुझा है देती ।

उसने ही दी बुझा तुम्हारेपौरुष की चिंगारी,जली न आँख देख कर खिंचतीद्रुपद-सुता की साड़ी ।

बाँध उसी ने मुझे द्विधा सेबना दिया कायर था,जगूँ-जगूँ जब तक, तब तक तोनिकल चुका अवसर था ।

यौवन चलता सदा गर्व सेसिर ताने, शर खींचे,झुकने लगता किन्तु क्षीण बलवे विवेक के नीचे ।

यौवन के उच्छल प्रवाह कोदेख मौन, मन मारे,सहमी हुई बुद्धि रहती हैनिश्छल खड़ीकिनारे ।

डरती है, बह जाए नहींतिनके-सी इस धारा में,प्लावन-भीत स्वयं छिपतीफिरती अपनी कारा में ।

हिम-विमुक्त, निर्विघ्न, तपस्यापर खिलता यौवन है,नयी दीप्ति, नूतन सौरभ सेरहता भरा भुवन है ।

किन्तु बुद्धि नित खड़ी ताक मेंरहती घातलगाए,कब जीवन का ज्वार शिथिल होकब वह उसे दबाये ।

और सत्य ही, जभी रुधिर कावेग तनिक कम होता,सुस्ताने को कहीं ठहरजाता जीवन का सोता ।

बुद्धि फेंकती तुरत जाल निजमानव फंस जाता है,नयी नयी उलझने लिएजीवन सम्मुखआता है ।

क्षमा या कि प्रतिकार, जगत मेंक्या कर्त्तव्य मनुज का ?मरण या कि उच्छेद ? उचितउपचार कौन है रूज का ?

बल-विवेक में कौन श्रेष्ठ है,असि वरेण्य या अनुनय ?पूजनीयरुधिराक्त विजयया करुणा-धौतपराजय ?

दो में कौन पुनीत शिखा है ?आत्मा की या मन की ?शमित-तेज वय की मति शिवया गति उच्छल यौवन की ?

जीवन की है श्रांति घोर, हमजिसको वय कहते हैं,थके सिंह आदर्श ढूंढते,व्यंगय-बाण सहते हैं ।

वय हो बुद्धि-अधीन चक्र परविवश घूमता जाता,भ्रम को रोक समय को उत्तर,तुरत नहीं दे पाता ।

तब तक तेज लूट पौरुष काकाल चला जाता है ।वय-जड़ मानव ग्लानि-मग्न होरोता-पछताता है ।

वय का फल भोगता रहा मैंरुका सुयोधन-घर में,रही वीरता पड़ी तड़पतीबंद अस्थि-पंजर में ।

न तो कौरवों का हित साधाऔर न पांडव का ही,द्वंद्व-बीच उलझा कर रक्खावय ने मुझे सदा ही ।

धर्म, स्नेह, दोनों प्यारे थेबड़ा कठिन निर्णय था,अत: एक को देह, दूसरे-को दे दिया हृदय था ।

किन्तु, फटी जब घटा, ज्योतिजीवन की पड़ी दिखाई,सहसा सैकत-बीच स्नेह कीधार उमड़ कर छाई ।

धर्म पराजित हुआ, स्नेह काडंका बजा विजय का,मिली देह भी उसे, दान थाजिसको मिला हृदय था ।

भीष्म न गिरा पार्थ के शर से,गिरा भीष्म का वय था,वय का तिमिर भेद वह मेरा,यौवन हुआ उदय था ।

हृदय प्रेम को चढ़ा, कर्म कोभुजा समर्पित करकेमैं आया था कुरुक्षेत्र मेंतोष हृदय में भर के ।

समझा था, मिट गया द्वंद्वपा कर यह न्याय-विभाजन,ज्ञात न था, है कहीं कर्म सेकठिन स्नेह का बंधन ।

दिखा धर्म की भीति, कर्ममुझसे सेवा लेता था,करने को बलि पूर्ण स्नेहनीरव इंगित देता था ।

धर्मराज, संकट में कृत्रिमपटल उघर जाता है,मानव का सच्चा स्वरूपखुल कर बाहर आता है ।

घमासान ज्यों बढ़ा, चमकनेधुंधली लगी कहानी,उठी स्नेह-वंदन करने कोमेरी दबी जवानी ।

फटा बुद्धि -भ्रम, हटा कर्म कामिथ्याजाल नयन से,प्रेम अधीर पुकार उठामेरे शरीर से, मन से-

लो, अपना सर्वस्व पार्थ !यह मुझको मार गिराओ,अब है विरह असह्य, मुझेतुम स्नेह-धाम पहुंचाओ ।

ब्रह्मचर्य्य के प्रण के दिन जोरुद्ध हुयी थी धारा,कुरुक्षेत्र में फूट उसी नेबन कर प्रेम पुकारा ।

बही न कोमल वायु, कुंजमन का था कभी न डोला,पत्तों की झुरमुट में छिप करबिहग न कोई बोला ।

चढ़ा किसी दिन फूल, किसी कामान न मैं कर पाया,एक बार भी अपने को थादान न मैं कर पाया ।

वह अतृप्ति थी छिपी हृदय केकिसी निभृत कोने में,जा बैठा था आँख बचाजीवन चुपके दोने में ।

वही भाव आदर्श-वेदि परचढ़ा फुल्ल हो रण में,बोल रहा है वही मधुरपीड़ा बन कर व्रण-व्रण में ।

मैं था सदा सचेत, नियंत्रण-बंध प्राण पर बांधे,कोमलता की ओर शरासनतान निशाना साधे ।

पर, न जानता था, भीतरकोई माया चलती है,भाव-गर्त के गहन वितल मेंशिखा छन्न जलती है ।

वीर सुयोधन का सेनापतिबन लड़ने आया था ;कुरुक्षेत्र में नहीं, स्नेह परमैं मरने आया था ।

सच है, पार्थ-धनुष पर मेरीभक्ति बहुत गहरी थी,सच है, उसे देख उठतीमन में प्रमोद-लहरी थी ।

"सच है, था चाहता पाण्डवोंका हित मैं सम्मन से,पर दुर्योधन के हाथों मेंबिका हुआ था तन से ।

"न्याय–व्यूह को भेद स्नेह नेउठा लिया निज धन है,सिद्ध हुआ, मन जिसे मिला,संपत्ति उसी की तन है ।

"प्रकटी होती मधुर प्रेम कीमुझ पर कहीं अमरता,स्यात देश को कुरूक्षेत्र कादिन न देखना पड़ता ।

"धर्मराज, अपने कोमलभावों की कर अवहेला ।लगता है, मैंने भी जग कोरण की ओर ढकेला ।

"जीवन के अरूणाभ प्रहर मेंकर कठोर व्रत धारण,सदा स्निग्ध भावों का यह जनकरता रहा निवारण ।

"न था मुझे विश्वास, कर्म सेस्नेह श्रेष्ठ, सुन्दर है,कोमलता की लौ व्रत केआलोकों से बढ़, कर है ।

"कर में चाप, पीठ पर तरकस,नीति–ज्ञान था मन में,इन्हें छोड, मैंने देखाकुछ और नहीं जीवन में ।

"जहाँ कभी अन्तर में कोर्इभाव अपरिचित जागे,झुकना पड़ा उन्हें बरबस,नय–नीति–ज्ञान के आगे ।

"सदा सुयोधन के कृत्यों सेमेरा क्षुब्ध हृदय था,पर, क्या करता, यहाँ सबल थीनीति, प्रबलतम नय था !

"अनुशासन का स्वत्व सौंप करस्वयं नीति के कर में,पराधीन सेवक बन बैठामैं अपने ही घर में,

"बुद्धि शासिका थी जीवन की,अनुचर मात्र हृदय था,मुझसे कुछ खुलकर कहने मेंलगता उसको भय था ।

कह न सका वह कभी, भीष्म !तुम कहाँ बहे जाते हो ?न्याय-दण्ड-धर हो कर भीअन्याय सहे जाते हो ।

प्यार पांडवों पर मन सेकौरव की सेवा तन से,सध पाएगा कौन कामइस बिखरी हुई लगन से ?

बढ़ता हुआ बैर भीषणपांडव से दुर्योधन का,मुझमें बिम्बित हुआ द्वंद्वबन कर शरीर से मन का ।

किन्तु, बुद्धि ने मुझे भ्रमित करदिया नहीं कुछ करने,स्वत्व छीन अपने हाथों काहृदय-वेदी पर धरने ।

कभी दिखती रही बैर केस्वयं-शमन का सपना,कहती रही कभी, जग मेंहै कौन पराया-अपना ।

कभी कहा, तुम बढ़े, धीरताबहुतों की छूटेगी,होगा विप्लव घोर, व्यवस्थाकी सरणी टूटेगी ।

कभी वीरता को उभाररोका अरण्य जाने से ;वंचित रखा विविध विध मुझकोइच्छित फल पाने से ।

आज सोचता हूँ, उसका यदिकहा न माना होता,स्नेह-सिद्ध शुचि रूप न्याय कायदि पहचाना होता ।

धो पाता यदि राजनीति काकलुष स्नेह के जल से,दंडनीति को कहीं मिलापाता करुणा निर्मल से ।

लिख पायी सत्ता के उर परजीभ नहीं जो गाथा,विशिख-लेखनी से लिखने मैंउसे कहीं उठ पाता ।

कर पाता यदि मुक्त हृदय कोमस्तक के शासन से,उतार पकड़ता बाँह दलित कीमंत्री के आसन से ।

राज-द्रोह की ध्वजा उठा करकहीं प्रचारा होता,न्याय-पक्ष लेकर दुर्योधनको ललकारा होता ।

स्यात सुयोधन भीत उठातापग कुछ अधिक संभल के,भरतभूमि पड़ती न स्यातसंगर में आगे चल के ।

पर, सब कुछ हो चुका, नहीं कुछशेष, कथा जाने दो,भूलो बीती बात, नएयुग को जग में आने दो ।

मुझे शांति, यात्रा से पहलेमिले सभी फल मुझको,सुलभ हो गए धर्म, स्नेहदोनों के संबल मुझको ।

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MLA 9 Ramdhari Singh "Dinkar". “कुरुक्षेत्र – चतुर्थ सर्ग.” Mansarovar Sahitya, https://www.mansarovarsahitya.in/poems/%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5-%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/. Accessed 8 Aug. 2026.
Chicago 17 Ramdhari Singh "Dinkar". “कुरुक्षेत्र – चतुर्थ सर्ग.” Mansarovar Sahitya. Accessed August 8, 2026. https://www.mansarovarsahitya.in/poems/%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5-%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/.
Reference रामधारी सिंह ‘दिनकर’। «कुरुक्षेत्र – चतुर्थ सर्ग»। Mansarovar Sahitya, https://www.mansarovarsahitya.in/poems/%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5-%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/।
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