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प्रबंध-काव्य

कुरुक्षेत्र – षष्ठ सर्ग

वीर रस, करुण रस

धर्म का दीपक, दया का दीप,कब जलेगा,कब जलेगा, विश्व में भगवान ?कब सुकोमल ज्योति से अभिसिक्तहो, सरस होंगे जली-सूखी रसा के प्राण ?

है बहुत बरसी धरित्री पर अमृत की धार,पर नहीं अब तक सुशीतल हो सका संसार ।भोग-लिप्सा आज भी लहरा रही उद्दाम,बह रही असहाय नर की भावना निष्काम ।

भीष्म हों अथवा युधिष्ठिर या कि हों भगवान,बुद्ध हों कि अशोक, गांधी हों कि ईसु महान;सिर झुका सबको, सभी को श्रेष्ठ निज से मान,मात्र वाचिक ही उन्हे देता हुआ सम्मान,

दग्ध कर पर को, स्वयं भी भोगता दुख-दाह,जा रहा मानव चला अब भी पुरानी राह ।अपहरण, शोषण वही, कुत्सित वही अभियान,खोजना चढ़ दूसरों के भस्म पर उत्थान;

शील से सुलझा न सकना आपसी व्यवहार,दौड़ना रह-रह उठा उन्माद कीतलवार ।द्रोह से अब भी वही अनुरागप्राण में अब भी वही फुँकार भरता नाग ।

पूर्व युग सा आज का जीवन नहीं लाचार,आ चुका है दूर द्वापर से बहुत संसार;यह समय विज्ञान का, सब भांति पूर्ण, समर्थ;खुल गए हैं गूढ संसृति के अमित गुरु अर्थ ।

चीरता तमको, संभाले बुद्धि की पतवारआ गया है ज्योति की नव भूमि में संसार ।आज की दुनिया विचित्र, नवीन;प्रकृति पर सर्वत्र है, विजयी पुरुष आसीन ।

हैं बंधे नर के करों में वारी, विद्युत, भाप,हुक्म पर चढ़ता उतरता है पवन का ताप ।है नहीं बाकी कहीं व्यवधान,लांघ सकता नर सरित, गिरि, सिंधु एक समान ।

सीस पर आदेश कर अवधार्य,प्रकृति के सब तत्त्व करते हैं मनुज के कार्य ।मानते हैं हुक्म मानव का महा वरुणेश,और करता शब्दगुण अंबर वहन संदेश ।

नव्य नर की मुष्टि में विकरालहैं सिमटते जा रहे प्रत्येक क्षण दिक्काल ।यह प्रगति निस्सीम ! नर का यह अपूर्व विकास !चरण तल भूगोल ! मुट्ठी में निखिल आकाश !

किन्तु है बढ़ता गया मस्तिष्क ही नि:शेष,छूट कर पीछे गया है रह हृदय का देश;नर मानता नित्य नूतन बुद्धि का त्योहार,प्राण में करते दुखी होदेवता चीत्कार ।

चाहिए उनको न केवल ज्ञानदेवता हैं मांगते कुछ स्नेह, कुछ बलिदान;मोम-सी कोई मुलायम चीज,ताप पा कर जो उठे मन में पसीज-पसीज;

प्राण के झुलसे विपिन में फूल कुछ सुकुमार;ज्ञान के मरू में सुकोमल भावना की धार;चाँदनी की रागनि, कुछ भोर की मुसकान;नींद में भूली हुई बहती नदी का गान;

रंग में घुलता हुआ खिलती कली का राज़;पत्तियों पर गूँजती कुछ ओस की आवाज़;आंसुओं में दर्द की गलती हुई तस्वीर;फूल की, रस में बसी-भीगी हुई जंजीर ।

धूम, कोलाहल, थकावट धूल के उस पार,शीतजल से पूर्ण कोई मंदगामी धार;वृक्ष के नीचे जहां मन को मिले विश्राम,आदमी काटे जहां कुछ छुट्टियाँ, कुछ शाम ।

कर्म-संकुल लोक-जीवन से समय कुछ छीन,हो जहां पर बैठ नर कुछ पल स्वयं में लीन ।फूल-सा एकांत में उर खोलने के हेतुशाम को दिन की कमाई तोलने के हेतु ।

ले चुकी सुख-भाग समुचित से अधिक है देह,देवता हैं मांगते मन के लिएलघु गेह ।हाय रे मानव ! नियति के दास !हाय रे मनुपुत्र, अपना आप ही उपहास !

प्रकृति को प्रच्छन्नता को जीतसिंधु से आकाश तक सबको किए भयभीत;सृष्टि को निज बुद्धि से करता हुआ परिमेयचीरता परमाणु की सत्ता असीम, अजेय,

बुद्धि के पवमान में उड़ता हुआ असहायजा रहा तू किस दशा की ओर को निरुपाय ?लक्ष्य क्या ? उद्देश्य क्या? क्या अर्थ ?यह नहीं यदि ज्ञात, तो विज्ञान का श्रम व्यर्थ ।

सुन रहा आकाश चढ़ ग्रह तारकों का नाद;एक छोटी बात ही पड़ती न तुझको याद ।एक छोटी, एक सीधी बात,विश्व में छायी हुर्इ है वासना की रात।

वासना की यमिनी, जिसके तिमिर से हार,हो रहा नर भ्रांत अपना आप ही आहार;बुद्धि में नभ की सुरभि, तन में रुधिर की कीच,यह वचन से देवता, पर, कर्म से पशु नीच ।

यह मनुज,जिसका गगन में जा रहा है यान,काँपते जिसके कारों को देख कर परमाणु ।खोल कर अपना हृदय गिरि, सिंधु, भू, आकाशहैं सुना जिसको चुके निज गुह्यतम इतिहास ।

खुल गए पर्दे, रहा अब क्या यहाँ अज्ञेयकिन्तु, नर को चाहिए नित विघ्न कुछ दुर्जेय,सोचने को और करने को नया संघर्ष,नव्य जय का क्षेत्र पाने को नया उत्कर्ष ।

पर धरा सुपरीक्षिता, विशिष्ट, स्वाद-विहीन,यह पढ़ी पोथी न दे सकती प्रवेग नवीन ।एक लघु हस्तामलक यह भूमि मण्डल गोल,मानवों ने पढ़ लिए सब पृष्ठ जिसके खोल ।

किन्तु, नर-प्रज्ञा सदा गतिशालिनी उद्दाम,ले नहीं सकती कहीं रुक एक पल विश्राम ।

यह परीक्षित भूमि, यह पोथी पठित, प्राचीनसोचने को दे उसे अब बात कौन नवीन ?यह लघु ग्रह भूमिमंडल, व्योम यह संकीर्ण,चाहिए नर को नया कुछ और जग विस्तीर्ण ।

घुट रही नर-बुद्धि की है सांस;चाहती वह कुछ बड़ा जग, कुछ बड़ा आकाश ।यह मनुज जिसके लिए लघु हो रहा भूगोलअपर-ग्रह-जय की तृषा जिसमें उठी है बोल ।

यह मनुज विज्ञान में निष्णात,जो करेगा, स्यात, मंगल और विधु से बात ।यह मनुज ब्रह्मांड का सबसे सुरम्य प्रकाश,कुछ छिपा सकते न जिससे भूमि या आकाश ।

यह मनुज जिसकी शिखा उद्दाम;कर रहे जिसको चराचर भक्तियुक्त प्रणाम ।यह मनुज, जो सृष्टि का शृंगार;ज्ञान का, विज्ञान का, आलोक का आगार ।

पर सको सुन तो सुनो, मंगल-जगत के लोग !तुम्हें छूने को रहा जो जीव कर उद्योग-वह अभी पशु है; निरा पशु, हिंस्र, रक्त पिपासु,बुद्धि उसकी दानवी है स्थूल की जिज्ञासु ।

कड़कता उसमें किसी का जब कभी अभिमान,फूंकने लगते सभी हो मत्त मृत्यु-विषाण ।

यह मनुज ज्ञानी, शृंगालों, कूकरों से हीनहो, किया करता अनेकों क्रूर कर्म मलिन ।

देह ही लड़ती नहीं, हैं जूझते मन-प्राण,साथ होते ध्वंस में इसके कला-विज्ञान ।इस मनुज के हाथ से विज्ञान के भी फूल,वज्र हो कर छूटते शुभ धर्म अपना भूल ।

यह मनुज, जो ज्ञान का आगार !यह मनुज, जो सृष्टि का शृंगार !नाम सुन भूलो नहीं, सोचो विचारो कृत्य;यह मनुज, संहार सेवी वासना का भृत्य ।

छद्म इसकी कल्पना, पाषंड इसका ज्ञान,यह मनुष्य मनुष्यता का घोरतम अपमान ।व्योम से पाताल तक सब कुछ इसे है ज्ञेय,पर, न यह परिचित मनुज का, यह न उसका श्रेय ।

श्रेय उसका बुद्धि पर चैतन्य उर की जीत;श्रेय मानव की असीमित मानवों से प्रीत;एक नर से दूसरे के बीच का व्यवधानतोड़ दे जो, है वही ज्ञानी, वही विद्वान ।

और मानव भी वही, जो जीव बुद्धि-अधीरतोड़ना अणु ही, न इस व्यवधान का प्राचीर;वह नहीं मानव; मनुज से उच्च, लघु या भिन्नचित्र-प्राणी है किसी अज्ञात ग्रह का छिन्न ।

स्यात, मंगल या शनिश्चर लोक का अवदानअजनबी करता सदा अपने ग्रहों का ध्यान ।रसवती भू के मनुज का श्रेययह नहीं विज्ञान, विद्या-बुद्धि यह आग्नेय;

विश्व-दाहक, मृत्यु-वाहक, सृष्टि का संताप,भ्रांत पाठ पर अंध बढ़ते ज्ञान का अभिशाप ।भ्रमित प्रज्ञा का कौतुक यह इन्द्र जाल विचित्र,श्रेय मानव के न आविष्कार ये अपवित्र ।

सावधान, मनुष्य! यदि विज्ञान है तलवार,तो इसे दे फेंक, तज कर मोह, स्मृति के पार ।हो चुका है सिद्ध, है तू शिशु अभी नादान;फूल-काँटों की तुझे कुछ भी नहीं पहचान ।

खेल सकता तू नहीं ले हाथ में तलवार;काट लेगा अंग, तीखी है बड़ी यह धार ।रसवती भू के मनुज का श्रेय,यह नहीं विज्ञान कटु, आग्नेय ।

श्रेय उसका प्राणमें बहती प्रणय की वायु,मानवों के हेतु अर्पित मानवों की आयु ।श्रेय उसका आंसुओं की धार,श्रेय उसका भग्न वीणा की अधीर पुकार ।

दिव्य भावों के जगत में जागरण का गान,मानवों का श्रेय आत्मा का किरण-अभियान ।यजन अर्पण, आत्मसुख का त्याग,श्रेय मानव का तपस्या की दहकती आग ।

बुद्धि-मंथन से विनिगत श्रेय वह नवनीत,जो करे नर के हृदय को स्निग्ध, सौम्य, पुनीत ।श्रेय वह विज्ञान का वरदान,हो सुलभ सबको सहज जिसका रुचिर अवदान ।

श्रेय वह नर-बुद्धि का शिवरूप आविष्कार,ढोसके जिससे प्रकृति सबके सुखों का भार ।मनुज के श्रम के अपव्यय की प्रथा रुक जाये,सुख-समृद्धि-विधान में नर के प्रकृति झुक जाये ।

श्रेय होगा मनुज का समता-विधायक ज्ञान,स्नेह-सिंचित न्याय पर नव विश्व का निर्माण ।एक नर में अन्य का नि:शंक, दृढ़ विश्वास,धर्म दीप्त मनुष्य का उज्ज्वल नया इतिहास-

समर, शोषण, ह्रास की विरुदावली सेहीन,पृष्ठ जिसका एक भी होगा न दग्ध, मलिन ।मनुज का इतिहास, जो होगा सुधामय कोष,छलकता होगा सभी नर का जहां संतोष ।

युद्ध की ज्वर-भीति से हो मुक्त,जब किहोगी, सत्यही, वसुधा सुधा से युक्त ।श्रेय होगा सुष्ठु-विकसित मनुज का यह काल,जब नहीं होगी धरा नर के रुधिर से लाल ।

श्रेय होगा धर्म का आलोक वहनिर्बन्ध,मनुज जोड़ेगा मनुज से जब उचित संबंध ।साम्यकि वह रश्मि स्निग्ध, उदार,कब खिलेगी, कब खिलेगी विश्व में भगवान ?कब सुकोमल ज्योति से अभिसिक्तहो सारस होंगे जली-सूखी रसा के प्राण ?

सप्तम सर्ग

रागानल के बीच पुरुष कंचन-सा जलने वालातिमिर-सिंधु में डूब रश्मि की ओर निकलने वाला,ऊपर उठने को कर्दम से लड़ता हुआ कमल सा,ऊब-डूब करता, उतराता घन में विधु-मण्डल-सा ।

जय हो, अघ के गहन गर्त में गिरे हुये मानव की,मनु के सरल, अबोध पुत्र की, पुरुष ज्योति-संभव की ।हार मानहो गयी न जिसकी किरण तिमिर की दासी,न्योछावर उस एक पुरुष पर कोटि-कोटि सन्यासी ।

मही नहीं जीवित है, मिट्टी से डरने वालों से,जीवित है वह उसे फूँक सोना करने वालों से,ज्वलित देख पंचाग्नि जगत से भाग निकलता योगी,धुनि बना कर उसे तापता अनासक्त रसभोगी ।

रश्मि देश की राह यहाँ तमसे हो कर जाती है,उषा रोज रजनी के सिरपर चढ़ी हुई आती है,और कौन है, पड़ा नहीं जो कभी पाप कारा में ?किसके वसन नहीं भीगे वैतरणी की धारा में ?

अथ से ले इति तक किसका पथ रहा सदा उज्ज्वल है ?तोड़ न सके तिमिर का बंधन, इतना कौन अबल है ?सूर्य-सोम दोनों डरते जीवन के पथ पिच्छल से,होते ग्रसित, पुन: चलते दोनों हो मुक्त कवल से ।

उठता गिरता शिखर, गर्त, दोनों से पूरित पथ पर,कभी विराट चलता मिट्टी पर, कभी पुण्य के रथ परकरता हुआ विकट रण-तम से पापी-पश्चात्तापि,किरण देश की ओर चला जा रहा मनुष्य-प्रतापी ।

जब तक है नर की आँखों में शेषव्यथा का पानी,जब तक है करती विदग्ध मानव को मलिन कहानी,जब तक है अवशिष्ट पुण्य-बल की नर में अभिलाषा,तब तक है अक्षुण्ण मनुज में मानवता की आशा ।

पुण्य-पाप दोनों वृन्तों पर यह आशा खिलती है,कुरुक्षेत्र के चिता-भस्म के भीतर भी मिलती है,जिसने पाया इसे, वही है सात्विक धर्म-प्रणेता,सत्सेवक मानव-समाज का, सखा, अग्रणी नेता ।

मिली युधिष्ठिर कोयह आशा आखिर रोते-रोते,आँसू के जल में अधीर, अंतर को धोते-धोते,कर्मभूमि के निकट वैरागी को प्रत्यागत पा कर,बोले भीष्म युधिष्ठिर का ही मनोभाव दुहराकर ।

अंत नहीं नर पंथ का, कुरुक्षेत्र की धूल,आँसू बरसें, तो यहीं खिले शांति का फूल ।

द्वापर समाप्त हो रहा है धर्मराज, देखो,लहर समेटने लगा है एक पारावार ।जग से विदा हो जा रहाहै काल-खंड एकसाथ लिए अपनी समृद्धि की चिता का क्षार ।

संयुग की धूलि में समाधियुग की ही बनीबहरही जीवन की आज भी अजस्रधार ।गत ही अचेत हो गिरा है मृत्यु गोद बीच,निकट मनुष्य के अनागत रहा पुकार ।

मृति के अधूरे, स्थूल भाग ही मिटे हैं यहाँनर का जलाहै नहीं भाग्य इस रण में ।शोणित में डूबा है मनुष्य, मनुजत्त्व नहीं,छिपता फिरा है देह छोड़ वह मन में ।

आशा है मनुष्य की मनुष्य में, न ढूंढो उसेधर्मराज, मानव का लोक छोड़ वन में,आशा मनुजत्त्व की विजेता के विलाप में हैआशा है मनुष्य की तुम्हारे अश्रुकण में ।

रण में प्रवृत्त राग-प्रेषित मनुष्य होतारहती विरक्त किन्तु, मानव की मति है ।मन से कराहता मनुष्य,पर, ध्वंस-बीचतन में नियुक्त उसे करती नियति है ।

प्रतिशोध से हो दृप्त वासना हँसाती उसे,मन को कुरेदती मनुष्यता की क्षति है ।वासना-विराग, दो कगारों में पछाड़ खातीजा रही मनुष्यता बनाती हुयी गति है ।

ऊंचा उठ देखो, तो किरीट, राज, धन, तप,जप, याग, योग से मनुष्यता महान है ।धर्म सिद्धरूप नहीं भेद-भिन्नता का यहाँकोई भी मनुष्य किसी अन्य के समान है ।

वह भी मनुष्य, है न धन और बल जिसे,मानव ही वह जो धनी या बलवान है ।मिला जो निसर्ग-सिद्ध जीवन मनुष्य को है,उसमें न दीखता कहीं भी व्यवधान है ।

अब तक किन्तु, नहीं मानव है देख सकाशृंग चढ़ जीवन की समता-अमरता ।प्रत्यय मनुष्य का मनुष्य में न दृढ़ अभी,एक दूसरे से अभी मानव है डरता ।

और है रहा सदैव शंकित मनुष्य यहएक दूसरे में द्रोह-द्वेष-विष भरता ।किन्तु, अब तक है मनुष्य बढ़ता ही गयाएक दूसरे से सदा लड़ता-झगड़ता ।

कोटि नर-वीर, मुनि मानव के जीवन कारहे खोजते ही शिव रूप आयु-भर हैं ।खोजते इसे ही सिंधु मथित हुआ है औरछोड़ गए व्योम में अनेक ज्ञान-शर हैं ।

खोजते इसे ही पाप-पंक में मनुष्यगिरे,खोजते इसे ही बलिदान हुये नर हैं ।खोजते इसे ही मानवों ने है विराग लियाखोजते इसे ही किए ध्वंसक समर हैं ।

खोजना इसे हो,तो जलाओ शुभ्र ज्ञान दीप,आगे बढ़ो वीर, कुरुक्षेत्र के शमशान से ।राग में विरागी, राज दंड-धर योगी बनो,नर को दिखाओ पंथ त्याग बलिदान से ।

दलित मनुष्य में मनुष्यता के भाव भरो,दर्प की दुराग्नि करो दूर बलवान से ।हिम-शीट भावना में आग अनुभूति की दो,छीन लो हलाहल उदग्र अभिमान से ।

रण रोकना है, तो उखाड़ विषदन्त फेंको,वृक-व्याघ्र-भीति से महि को मुक्तकर दो ।अथवा अजाके छागलों को भी बनाओ व्याघ्रदांतों में कराल काल कूट-विष भर दो ।

वट की विशालता के नीचे जो अनेक वृक्षठिठुर रहे हैं, उन्हें फैलने का वर दो ।रस सोखता है जो मही का भीमकाय वृक्ष,उसकी शिराएँ तोड़ो, डालियाँ कतर दो ।

धर्मराज, यह भूमि किसी कीनहीं क्रीत है दासीहैं जन्मना समान परस्परइसके सभी निवासी ।

है सबको अधिकार मृत्ति कापोषक-रस पीने काविविध अभावों से अशंक हो-कर जग में जीने का ।

सबको मुक्त प्रकाश चाहिए,सबको मुक्त समीरण,बाधा-रहित विकास, मुक्तआशंकाओं से जीवन ।

उद्भिज-निभ चाहते सभी नरबढ्न मुक्त गगन मेंअपना चरम विकास खोजनाकिसी प्रकार भुवन में ।

लेकिन, विघ्न अनेक अभीइस पाठ में पड़े हुये हैंमानवता की राह रोक करपर्वत अड़े हुये हैं ।

न्यायोचित सुख सुलभ नहींजब तक मानव-मानव कोचैन कहाँ धरती पर, तब तकशांति कहाँ इस भाव को ?

जब तक मनुज-मनुज का यहसुख भाग नहीं सम होगाशमित न होगा कोलाहलसंघर्ष नहीं कम होगा ।

था पाठ सहज अतीव, सम्मिलितहो समग्र सुख पानाकेवल अपने लिए नहींकोई सुख-भाग चुराना ।

उसे भूल नर फंसा परस्परकी शंका में, भय में,निरत हुआ केवल अपने हीहेतु भोग संचय में ।

इस वैयक्तिक भोगवाद सेफूटी विष की धारा,तड़प रहा जिसमें पड़ करमानव-समाज यह सारा ।

प्रभु के दिये हुये सुख इतनेहैं विकीर्ण धरणी परभोग सकें जो,जगत में,कहाँ अभी इतने नर ?

भू से ले अंबर तक यह जलकभी न घटने वाला,यह प्रकाश, यह पवन कभी भीनहीं सिमटने वाला ।

यह धरती फल, फूल, अन्न, धन-रत्न उगलने वालीयह पालिका मृगव्य जीव कीअटवी सघन निराली ।

तुंग शृंग ये शैल कि जिनमेंहीरक-रत्न भरे हैं,ये समुद्र जिनमें मुक्ताविद्रुम, प्रवाल बिखरे हैं ।

और मनुज कीनयी नयीप्रेरक वे जिज्ञासाएँ !उसकी वे सुबलिष्ठ, सिंधु मंथनमें दक्ष भुजाएँ ।

अन्वेषणी बुद्धि वहतम में भी टटोलने वाली,नव रहस्य, नव रूप प्रकृति कानित्य खोलने वाली ।

इस भुज, इस प्रज्ञाके सम्मुखकौन ठहर सकता है ?कौन विभव वह, जो कि पुरुष कोदुर्लभ रह सकता है ?

इतना कुछ है भरा विभव काकोष प्रकृति के भीतरनिज इच्छित सुख-भोग सहजही पा सकते नारी-नर ।

सब हो सकते तुष्ट एक सासब सुख पा सकते हैंचाहें तो, पल में धरती कोस्वर्ग बना सकते हैं ।

छिपा दिये सबतत्त्व आवरणके नीचे ईश्वर नेसंघर्षों से खोज निकालाउन्हें उद्यमी नर ने ।

ब्रह्मा से कुछ लिखा भाग्य मेंमनुज नहीं लाया है,अपना सुख उसने अपनेभुजबल से ही पाया है ।

प्रकृति नहीं डर कर झुकती हैकभी भाग्य के बल सेसदा हारती वह मनुष्य केउद्यम से, श्रमजल से ।

ब्रह्मा का अभिलेख पढ़ाकरते निरुद्यमी प्राणीधोते वीर कु-अंक भाल काबहा भ्रुवों से पानी ।

भाग्यवाद आवरण पाप काऔर शस्त्र शोषण का,जिससे रखता दबा एक जनभाग दूसरे जन का ।

पुछो किसी भाग्यवादी सेयदि विधि अंक प्रबल हैपदपर क्यों देती न स्वयंवसुधा निज रत्न उगल है ?

उपजाता क्यों विभव प्रकृति कोसींच-सींच वह जल से ?क्यों न उठा लेता निज संचितकोष भाग्य के बल से ।

और मरा जब पूर्व जन्म मेंवह धन संचित करकेविदा हुआ था न्यास समर्जितकिसके घर में धरके ।

जन्मा है वह जहां, आजजिस पर उसका शासन हैक्या है यह घर वही? औरयह उसी न्यास का धन है ?

यह भी पूछो, धन जोड़ाउसने जब प्रथम-प्रथम थाउस संचय के पीछे तबकिस भाग्यवाद का क्रम था ?

वही मनुज के श्रम का शोषणवही अनयमय दोहन,वही मलिन छल नर-समाज सेवही ग्लानिमय अर्जन ।

एक मनुज संचित करता हैअर्थ पाप के बल से,और भोगता उसे दूसराभाग्यवाद के छल से ।

नर-समाज का भाग्य एक हैवह श्रम, वह भुज-बल है,जिसके सम्मुख झुकी हुईपृथिवी, विनीत नभ-तल है ।

जिसने श्रम जल दिया, उसेपीछे मत रह जाने दो,विजित प्रकृति से सबसे पहलेउसको सुख पाने दो ।

जो कुछ न्यस्त प्रकृति में है,वह मनुज मात्र का धन है,धर्मराज, उसके कण-कण काअधिकारी जन-जन है ।

सहज-सुरक्षित रहता यहअधिकार कहीं मानव काआज रूप कुछ और दूसराही होता इस भव का ।

श्रम होता सबसे अमूल्य धनसब जन खूब कमातेसब अशंक रहते अभाव सेसब इच्छित सुख पाते ।

राजा-प्रजा नहीं कुछ होताहोते मात्र मनुज हीभाग्य-लेख होता न मनुज कोहोता कर्मठ भुज ही ।

कौन यहाँ राजा किसका है ?किस की कौन प्रजा है ?नर ने हो कर भ्रमित स्वयं हीयह बंधन सिरजा है ।

बिना विघ्न जल, अनिल सुलभ हैआज सभी को जैसेकहते हैं, थी सुलभ भूमि भीकभी सभी को वैसे ।

नर नर का प्रेमी था मानवमानव का विश्वासीअपरिग्रह था नियम, लोग थेकर्म-लीन सन्यासी ।

बंधे धर्म केबंधन मेंसब लोग जिया करते थेएक दूसरे का दुख हँसकरबाँट लिया करते थे ।

उच्च-नीच का भेद नहीं था;जन-जन में समताथीथा कुटुम्ब-सा जन-समाज,सब पर सबकी ममताथी ।

जी भर करते काम, ज़रूरत भरसब जन थे खाते,नहीं कभी निज को औरों सेथे विशिष्ट बतलाते ।

सब थे बद्ध समष्टि-सूत्रमें,कोई छिन्न नहीं थाकिसी मनुज का सुख समाज केसुख से भिन्न नहीं था ।

चिंता न थी किसी को कुछनिज-हित संचय करने की,चुरा ग्रास मानव-समाज काअपना घर भरने की ।

राजा-प्रजा नहीं था कोईऔर नहीं शासन थाधर्म नीति का जन-जन केमन-मन पर अनुशासन था ।

अब जो व्यक्ति-स्वत्व रक्षित हैदण्ड-नीति के कर सेस्वयं समादृ तथा वह पहलेधर्म-निरतनर नर से ।

ऋजु था जीवन-पंथ, चतुर्दिकथीं उन्मुक्त दिशाएँ,पग-पग पर थीं अड़ी राज्य-नियमों की नहीं शिलाएँ ।

अनायास अनुकूल लक्ष्य कोमानव पा सकता थानिज विकास की चरम भूमि तकनिर्भय जा सकता था ।

तब बैठा कलि-भाव स्वार्थ बनकर मनुष्य के मन मेंलगा फैलने गरल लोभ काछिपे छिपे जीवन में ।

पड़ा कभी दुष्काल, मरे नर,जीवित का मन डोला,उर के किसी निभृत कोने सेलोभ मनुज का बोला ।

हाय, रखा होता संचित करतूने यदि कुछ अपनाइस संकट में आज नहींपड़ता यों तुझे कलपना ।

नहीं टूटती तुझ पर सब केसाथ विपद यह भारी,जाग मूढ़, आगे के हितअब भी तो कर तैयारी ।

और, जगा, सचमुच मनुष्यपछतावे से घबरा कर,लगा जोड़ने अपना धनऔरों की आँख बचा कर ।

चला एक नर जिधर, उधर हीचले सभी नर-नारी,होने लगी आत्मरक्षा कीअलग-अलग तैयारी ।

लोभ-नागिनी ने विष फूंका,शुरू हो गयी चोरी,लूट, मार, शोषण, प्रहारछीना-झपटी, बरजोरी ।

छिन्न-भिन्न हो गयी शृंखलानर-समाज की सारी,लगी डूबने कोलाहल केबीच महि बेचारी ।

तब आयी तलवार शमितकरने को जगद्दहन कोसीमा में बांधने मनुज कीनयी लोभ नागिन को ।

और खड़गधर पुरुष विक्रमीशासक बना मनुज कादण्ड-नीति-धारी त्रासकनर-तन में छिपे दनुज का ।

तज समष्टि को व्यष्टि चली थीनिज को सुखी बनाने,गिरि गहन दासत्व-गर्त केबीच स्वयं अनजाने ।

नर से नर का सहज प्रेमउठ जाता नहीं भुवन से,छल करने में सकुचाता यदिमनुज कहीं परिजन से ।

रहता यदि विश्वास एक मेंअचल दूसरे नर कानिज सुख चिंतन में न भूलतावह यदि ध्यान अपरका ।

रहता याद उसे यदि, वह कुछऔर नहीं है, नर हैविज्ञ वंशधर मनु का, पशु-पक्षी से योनि इतर है ।

तो न मानता कभी मनुजनिज सुख गौरव खोने में,किसी राजसत्ता के सम्मुखविनत दास होने में ।

सह न सका जो सहज-सुकोमलस्नेह सूत्र का बंधन,दण्ड-नीति के कुलिश-पाश मेंअब है बद्ध वही जन ।

दे न सका नर को नर जोसुख-भाग प्रीति से, नय सेआज दे रहा वही भाग वहराज-खड़ग के भय से ।

अवहेला कर सत्य-न्याय केशीतल उद्दगारों कीसमझ रहा नर आज भली विधभाषा तलवारों की ।

इससे बढ़ कर मनुज-वंश काऔर पतन क्या होगा ?मानवीय गौरव का बोलोऔर हनन क्या होगा ?

नर-समाज को एक खड़गधरनृपति चाहिए भारी,डरा करें जिससे मनुष्यअत्याचारी, अविचारी ।

नृपति चाहिए, क्योंकि परस्परमनुज लड़ा करते हैंखड्ड चाहिए, क्योंकि न्याय सेवे न स्वयं डरते हैं ।

नृपति चाहिए जो कि उन्हेंपशुओं की भांति चराएरखे अनय से दूर, नीति-नयपग-पगपर सिखलाये ।

नृप चाहिए नरों को, जोसमझे उनकी नादानीरहे छींटता पल-पलपारस्परिक कलह पर पानी ।

नृप चाहिए, नहीं तो आपसमें वे खूब लड़ेंगेएक दूसरे के शोणित मेंलड़ कर डूब मरेंगे ।

राजतंत्र द्योतक है नर कीमलिन निहीन प्रकृति कामानवता की ग्लानि औरकुत्सित कलंक संस्कृति का ।

आया था यह प्रगति रोकनेको केवल दुर्गुण कीनहीं बांधने को सीमाउन्मुक्त पुरुष के गुण की ।

सो देखो, अब दिशा विचारोंकी भी निर्धारित हैराज-नियम से परे कर्म क्या,चिंतन भी वारित है ।

कृष्ण हों कि हों विदुर, नियोजितसब पर एक नियम हैसब के मन, वच और कर्म परअनुशासन का क्रम है ।

इनकी भी यदि क्रिया रहीअनुकूल नहीं सत्ता केतो ये भी तृणवत नगण्य हैंसम्मुख राज प्रथा के ।

जो कुछ है, उसका रक्षण हीध्येय एक शासन का;नयी भूमि की ओर न बहसकता प्रवाह जीवन का ।

कहीं रूढ़ि-विपरीत बातकोई न बोल सकता हैनया धर्म का भेद मुक्तहो कर न खोल सकता है ।

ग्रीवा पर दु:शील तंत्र कोशिला भयानक धारेघूम रहा है मनुज जगत मेंअपना रूप बिसारे ।

अपना बस रख सका नहींअविचल वह अपने मन पर,अत: बिताया एक खड़गधरप्रहरी निज जीवन पर ।

और आज प्रहरी न देताउसे न हिलने-डुलनेरूढ़ि बंध से परे मनुज कारूप निराला खुलने ।

किन्तु, स्वयं नर ने कु कृत्य सेसंभव किया इसे है,आपस में लड़-झगड़ उसी सेआदर दिया इसे है ।

जब तक स्वार्थ-शैल मानव केमन का चूरन होगातब तक नर-समाज से असिधरप्रहरी दूर न होगा ।

नर है विकृत अत:, नरपतिचाहिए धर्म-ध्वज-धारीराजतंत्र है हेय, इसीसेराज धर्म है भारी ।

धर्मराज, सन्यास खोजनाकायरता है मन कीहै सच्चा मनुजत्व ग्रंथियांसुलझाना जीवन की ।

दुर्लभ नहीं मनुज के हित,निज वैयक्तिक सुख पानाकिन्तु कठिन है कोटि-कोटिमनुजों को सुखी बनाना ।

एक पंथ है, छोड़ जगत कोअपने में रम जाओ,खोजो अपनी मुक्ति औरनिज को ही सुखी बनाओ ।

अपर पंथ है, औरों को भीनिज-विवेक बल दे कर,पहुँचो स्वर्ग-लोक में जग सेसाथ बहुत को ले कर ।

जिस तप से तुम चाह रहेपाना केवल निज सुख कोकर सकता है दूर वही तपअमित नरों के दुख को ।

निज तप रखो चुरा निज हित,बोलो क्या न्याय यही है ?क्या समष्टि-हित मोक्षदान काउचित उपाय यही है ?

निज को ही देखो न युधिष्ठिर !देखो निखिल भुवन कोस्ववत शांति-सुख की ईहा मेंनिरत, व्यग्र जन जन को ।

माना, इच्छित शांति तुम्हारीतुम्हें मिलेगी वन मेंचरण चिह्न पर, कौन छोड़जाओगे यहाँ भुवन में ?

स्यात दु:ख से तुम्हें कहींनिर्जन में मिले किनाराशरण कहाँ पाएगा पर, यहदह्यमान जग सारा ।

और कहीं आदर्श तुम्हाराग्रहण कर नर-नारीतो फिर जाकर बसे विपिन मेंउखाड़ सृष्टि यह सारी ।

बसी भूमि मरघट बन जायेराजभवन हो सूनाजिससे डरता यति, उसी काबन बन जाये नमूना ।

त्रिविध ताप में लगें वहाँ भीजलने यदि पुरवासी,तो फिर भागे उठा कमंडलुवन से भी सन्यासी ।

धर्मराज, क्या यति भागताकभी गेहया वन से ?सदा भागता फिरता है वहएक मात्र जीवन से ।

वह चाहता सदैव मधुर रस,नहीं तिक्तया लोनावह चाहता सदैव प्राप्ति हीनहीं कभी कुछ खोना ।

प्रमुदित पा कर विजय, पराजयदेख खिन्न होता हैहँसता देख विकास, ह्रास कोदेख बहुत रोता है ।

रह सकता न तटस्थ, खीझता,रोता, अकुलाता है,कहता, क्यों जीवन उसकेअनुरूप न बन जाता है ।

लेकिन, जीवन जुड़ा हुआ हैसुघर एक ढांचे मेंअलग-अलग वह ढला करेकिसके-किसके सांचे में ?

यह अरण्य, झुरमुट जो काटे,अपनी राह बना ले,क्रीतदास यह नहीं किसी काजो चाहे, अपना ले ।

जीवन उनका नहीं युधिष्ठिर,जो उससे डरते हैंवह उनका, जो चरण रोपनिर्भय हो कर लड़ते हैं ।

यह पयोधि सबका मुख करताविरत लवण-कटुजल सेदेता सुधा उन्हें, जो मथतेइसे मंदराचल से ।

बिना चढ़े फुनगी पर जोचाहता सुधा फल पानापीना रस पीयूष, किन्तुयह मन्दर नहीं उठाना ।

खारा कह जीवन-समुद्र कोवही छोड़ देता हैसुधा-सुरा-मणि-रत्न कोष सेपीठ फेर लेता है ।

भाग खड़ा होता जीवन सेस्यात सोच यह मन मेंसुख का अक्षय कोष कहींप्रक्षिप्त पड़ा है वन में ।

जाते ही वह जिसे प्राप्त करसब कुछ पा जाएगागेह नहीं छोड़ा कि देह धरफिर न कभी आएगा ।

जनाकीर्ण जग से व्याकुल होनिकल भागना वन में; धर्मराज, है घोर पराजयनर की जीवन रण में ।

यह निवृति है ग्लानि, पलायनका यह कुत्सित क्रम हैनि: श्रेयस यह श्रमित, पराजितविजित बुद्धि का भ्रम है ।

इसे दीखती मुक्ति रोर से,श्रवण मूँद लेने मेंऔर दहन से परित्राण-पथपीठ फेर देने में ।

मरुद्भित प्रति काल छिपातीसजग, क्षीण-बल तप कोछाया में डूबती छोड़ करजीवन के आतप को ।

कर्म-लोक से दूर पलायनकुंज बसा कर अपनानिरी कल्पना में देखाकरती अलभ्य का सपना ।

वह सपना, जिस पर अंकितउंगली का दाग नहीं है,वह सपना, जिसमे ज्वलंतजीवन की आग नहीं है ।

वह सपनों का देश कुसुम हीकुसुम जहां खिलते हैं,उड़ती कहीं न धूल, न पथ मेंकंटक ही मिलते हैं ।

कटु की नहीं, मात्र सत्ता हैजहां मधुर, कोमल कीलौह पिघल कर जहां रश्मिबन जाता विधु-मण्डल की ।

जहां मानती हुक्म कल्पनाका जीवन धारा हैहोता सब कुछ वही, जो किमानव-मन को प्यारा है ।उस विरक्त से पूछो, मन सेवह जो देख रहा है,उस कल्पना जनित जग काभू पर अस्तित्व कहाँ है ?

कहाँ वीथि है वह, सेवित हैजो केवल फूलों सेकहाँ पंथ वह, जिस पर छिलतेचरण नहीं शूलों से ?

कहाँ वाटिका वह, रहती जोसतत प्रफुल्ल हरी है ?व्योम खंड वह कहाँ,कर्म-रज जिसमें नहीं भरी है ?

वह तो भाग छिपा चिंतन मेंपीठ फेर कर रण से,विदा हो गए, पर, क्या इससेदाहक दुख भुवन से ?

और, कहें, क्या स्वयं उसेकर्तव्य नहीं करना है ?नहीं कमा कर सही, भीख सेक्या न उदर भरना है ?

कर्मभूमि है निखिल महीतलजब तक नर की कायातब तक है जीवन के अणु-अणुमें कर्तव्य समाया ।

क्रिया-धर्म को छोड़ मनुजकैसे निज सुख पाएगा ?कर्म रहेगा साथ, भाग वहजहां कहीं जाएगा ।

धर्मराज, कर्मठ मनुष्य कापथ सन्यास नहीं है,नर जिस पर चलता, वहमिट्टी है, आकाश नहीं है ।

ग्रहण कर रहे जिसे आजतुम निर्वेदाकुल मन सेकर्म-न्यास वह तुम्हें दूरले जाएगा जीवन से ।

दीपक का निर्वाण बड़ा कुछश्रेय नहीं जीवन का,है सद्धर्म दीप्त रख उसकोहरना तिमिर भुवन का ।

भ्रमा रही तुमको विरक्ति जो,वह अस्वस्थ, अबल है,अकर्मण्यता की छाया, वहनिरे ज्ञान का छल है ।

बचो युधिष्ठिर, कहीं डुबो देतुम्हें नयह चिंतन में,निष्क्रियता का धूम भयानकभर न जाये जीवन में ।

यह विरक्ति निष्कर्म बुद्धि कीऐसी क्षिप्र लहर है,एक बार जो उड़ा, लौटसकता न पुन:वह घर है ।

यह अनित्य कह-कह कर देतीस्वाद हीन जीवन कोनिद्रा को जागृति बतातीजीवन अचल मरण को ।

सत्ता कहती अनस्तित्व कोऔर लाभ खोने को,श्रेष्ठ कर्म कहती निष्क्रियता,में विलीन होने को ।

कहती सत्य उसे केवल,जो कुछ गोतीत, अलभ हैमिथ्या कहती उस गोचर कोजिसमें कर्म सुलभ है ।

कर्महीनता को पनपातीहै विलाप के बल सेकाट गिराती जीवन केतरु को विराग के छल से ।

सह सकती यह नहीं कर्म संकुलजग के कल-कल कोप्रशमित करती अत:, विविध विधनर के दीप्त अनल को ।

हर लेती आनंद-ह्रासकुसूमों का यह चुम्बन से,और प्रगतिमय कंपन जीवित,चपल तुहिन के कण से ।

शेष न रहते सबल गीतइसके विहंग के उर में,बजती नहीं बांसुरी इसकीउदद्वेलन के सुर में ।

पौधों से कहती यह, तुम मतबढ़ो, वृद्धि ही दुख है,आत्म नाश है मुक्ति महत्तम,मुरझाना ही सुख है ।

सुविकच, स्वस्थ, सुरम्य-सुमन कोमरण भीति दिखला कर,करती है रस-भंग, काल काभोजन उसे बता कर ।

श्री, सौंदर्य, तेज, सुखसबसे हीन बना देती है,यह विरक्ति मानव को दुर्बल,दीन बना देती है ।

नहीं मात्र उत्साह-हरणकरती नर के प्राणों से,लेती छीन प्रताप भुजा सेऔर दीप्त बाणों से ।

धर्मराज, किसको न ज्ञातहैयह कि अनित्य जगत हैजनमा कौन, काल का जो नरहुआ नहीं अनुगत है ?

किन्तु, रहे पल-पल अनियताही जिस नर पर छाईनश्वरता को छोड़ पड़ेकुछ और नहीं दिखलाई ।

द्विधा मूढ़ वह कर्म योग सेकैसे कर सकता हैकैसे हो सन्नद्ध जगत केरण में लड़ सकता है ?

तिरस्कार कर वर्तमानजीवन के उदद्वेलन काकरता रहता ध्यान अहर्निशजो विद्रूप मरण का ।

अकर्मण्य वह पुरुष काम,किसके, कब आ सकता है ?मिट्टी पर कैसे वह कोईकुसुम खिला सकता है ?

सोचेगा वह सदा, निखिलअवनी तल ही नश्वर है,मिथ्या यह श्रम-भार, कुसुम हीहोता कहाँ अमर है ?

जगको छोड़ खोजता फिरताअपनी एक अमरता,किन्तु, उसे भी अभी लीलजाती अजेय नश्वरता ।

पर, निर्विघ्न सरणि जग कीतब भी चलती रहती हैएक शिखा ले भार अपर काजलती ही रहती है ।

झर जाते हैं कुसुम जीर्ण दलनए फूल खिलते हैंरुक जाते कुछ, दल में फिरकुछ नए पथिक मिलते हैं ।

अकर्मण्य पंडित हो जाताअमर नहीं रोने सेआयु न होती क्षीण किसी कीकर्म भार ढोने से ।

इतना भेद अवश्य युधिष्ठिर !दोनों में होता है,हँसता एक मृत्ति पर,नभ में एक खड़ा रोता है ।

एक सजाता है धरती काअंचल फुल्ल कुसुम से,भरता भूतल में समृद्धि-सुषमाअपने भुज बल से ।

पंक झेलता हुआ भूमि कात्रिविध ताप को सहताकभी खेलता हुआ ज्योति सेकभी तिमिर में बहता ।

अधम अतल को फोड़ बहाताधार मृत्ति के पय कीरस पीता, दुंदुभि बजातामानवता की जय की ।

होता विदा जगत से, जग कोकुछ रमणीय बना कर,साथ हुआ था जहां, वहाँ सेकुछ आगे पहुंचा कर ।

और दूसरा कर्महीन चिंतनका लिए सहाराअंबुधि में निर्यान खोजताफिरता विफल किनारा ।

कर्मनिष्ठ नर की भिक्षा परसदा पालते तन कोअपने को निर्लिप्त, अधमबतलाते निखिल भुवन को ।

कहता फिरता सदा, जहां तकदृश्य वहाँ तक छल हैजो अदृश्य, जो अलभ, अगोचरसत्य वही केवल है ।

मानों सचमुच ही मिथ्या होकर्मक्षेत्र यह कायामानों, पुण्य-प्रताप मनुज केसचमुच ही हों माया ।

मानों, कर्म छोड़ सचमुच हीमनुज सुधर सकता हो,मानों, वह अम्बर पर तज करभूमि ठहर सकता हो ।

कलुष निहित, मानों सच ही होजन्म-लाभ लेने मेंभुज से दुखका विषम भारईषल्लघु कर देने में ।

गंध, रूप, रस, शब्द, स्पर्शमानों, सचमुच फाटक होंरसना, त्वचा, घ्राण, दृग, श्रुतिज्यों मित्र नहीं घातक हों ।

मुक्ति-पंथखुलता हो, मानों,सचमुच, आत्महनन सेमानों, सचमुच ही, जीवन होसुलभ नहीं जीवन से ।

मानो, निखिल सृष्टि यह कोईआकस्मिक घटना होजन्म साथ उद्देश्य मनुज कामानों नहीं सना हो ।

धर्मराज क्या दोष हमाराधरती यदि नश्वर है ?भेजा गया, यहाँ पर आयास्वयं न कोई नर है ।

निहित न होता भाग्य मनुज कायदि मिट्टी नश्वर मेंचित्र-योनि धार मनुज जनमतास्यात, कहीं अम्बर में-

किरण रूप, निष्काम, रहित होक्षुधा-तृषा के रुज सेकर्म-बंध से मुक्त, हीं दृग,श्रवण, नयन, पद, भुज से ।

किन्तु, मृत्ति है कठिन, मनुज कोभूख लगा करती हैत्वच से मन तक विविध भांतिकी तृषा जागा करती है ।

यह तृष्णा, यह भूख न देतीसोने कभी मनुज कोमन को चिंतन-ओर, कर्म कीओर भेजती भुज को ।

मन का स्वर्ग मृषा वह, जिसकोदेह न पा सकती हैइससे तो अच्छा वह, जो कुछभुजा बना सकती है ।

क्योंकि भुजा जो कुछ लातीमन भी उसको पाता हैनीरा ध्यान, भुज क्या? मन को भीदुर्लभ रह जाता है ।सफल भुजा वह, मन को भी जोभरे प्रमोद लहर सेसफल ध्यान, अंकन असाध्यरह जाये न जिसका कर से ।

जहां भुजा का एक पंथ होअन्य पंथ चिंतन कासम्यक रूप नहीं खुलता उसद्वंद्व-ग्रस्त जीवन का ।

केवल ज्ञानमयी निवृत्ति सेद्विधा न मिट सकती हैजगत छोड़ देने से मन कीतृषा न घट सकती है ।

बाहर नहीं शत्रु, छिप जायेजिसे छोड़ नर वन मेंजाओ जहां, वहीं पाओगेइसे उपस्थित मन में ।

पर जिस अरि को यती जीतताजग से बाहर जा करधर्मराज, तुम उसे जीतसकते जग को अपना कर ।

हठयोगी जिसका वध करताआत्म हनन के क्रम सेजीवित ही तुम उसे स्व-वश मेंकर सकते संयम से ।

और जिसे पा कभी न सकतासन्यासी वैरागीजग में रह कर हो सकते तुमउस सुख के भी भागी ।

वह सुख जो मिलता असंख्यमनुजों का अपना हो करहंस कर उसके साथ हर्ष मेंऔर दुख में रो कर ।

वह, जो मिलता भुजा पंगु कीओर बढ़ा देने सेकंधों पर दुर्बल-दरिद्र काबोझ उठा लेने से ।

सुकृत-भूमि वन ही न; महि यहदेखो बहुत बड़ी हैपग-पगपर साहाय्य-हेतुदीनता विपिन्न खड़ी है ।

इसे चाहिए अन्न, वसन, जल,इसे चाहिए आशा,इसे चाहिए सुदृढ़ चरण, भुजइसे चाहिए भाषा ।

इसे चाहिए वह झांकी,जिसको तुम देख चुके हो,इसे चाहिए वह मंज़िलतुम आकर जहां रुके हो ।

धर्मराज, जिसके भय से तुमत्याग रहे जीवन कोउस प्रदाह में देखो जलतेहुये समग्र भुवन को ।

यदि सन्यास शोध है इसकातो मत युक्ति छिपाओसब हैं विकल, सभी को अपनामोक्ष मंत्र सिखलाओ ।

जाओ शमित करो निज तप सेनर के रागानल कोबरसाओ पीयूष, करोअभिसिक्त दग्ध भूतल को ।

सिंहासन का भाग छीन करदो मत निर्जन वन कोपहचानो निज कर्म युधिष्ठिर !कड़ा करो कुछ मन को ।

क्षत-विक्षत है भरत-भूमि काअंग-अंगवाणों सेत्राहि-त्राहि का नाद निकलताहै असंख्य प्राणों से ।

कोलाहल है महा त्रास है,विपद आज है भारी,मृत्यु-विवर से निकल चतुर्दिकतड़प रहे नर-नारी ।

इन्हें छोड़ वन में जा कर तुमकौन शांति पाओगे ?चेतन की सेवा तज जड़ कोकैसे अपनाओगे ?

पोंछो अश्रु, उठो, द्रुत जाओवन में नहीं भुवन मेंहोओ खड़े असंख्य नरों कीआशा बन जीवन में ।

बुला रहा निष्काम कर्म वह,बुला रही है गीताबुला रही है तुम्हें आर्त होमहि समर-संभीता ।

इस विविक्त, आहत वसुधा कोअमृत पिलाना होगाअमित लता-गुल्मों में फिर सेसुमन खिलाना होगा ।

हरना होगा अश्रु तापहृत-बंधु अनेक नरों कालौटाना होगा सुहासअगणित-विषण्ण अधरों का ।

मरे हुओं पर धर्मराज,अधिकार न कुछ जीवन काढोना पड़ता सदाजीवितों को ही भार भुवन का ।

मरा सुयोधन जभी, पड़ायह भार तुम्हारे पालेसंभलेगा यह सिवा तुम्हारेकिसके और संभाले ?

मिट्टी का यह भार संभालोबन कर्मठ सन्यासीपा सकता कुछ नहीं मनुजबन केवल व्योम प्रवासी ।

ऊपर सब कुछ शून्य-शून्य है,कुछ भी नहीं गगन में,धर्मराज! जो कुछ है, वह हैमिट्टी में, जीवन में ।

सम्यक विधि से इसे प्राप्त करनर सब कुछ पाता हैमृत्ति-जयी के पास स्वयं हीअम्बर भी आता है ।

भोगो तुम इस भांति मृत्ति कोदाग नहीं लग पायेमिट्टी में तुम नहीं, वहीतुममें विलीन हो जाये ।

और सिखाओ भोगवाद कीयही रीति जन-जन कोकरें विलीन देह को मन मेंनहीं देह में मन को ।

मन का होगा आधिपत्यजिस दिन मनुष्य के तन परहोगा त्याग अधिष्ठित जिस दिनभोग-लिप्त जीवन पर ।

कंचन को नर साध्य नहींसाधन जिस दिन जानेगाजिस दिन सम्यक रूप मनुज कामानव पहचानेगा ।

वल्कल-मुकुट, परे दोनों केछिपा एक जो नर हैअन्तर्वासी एक पुरुष जोपिंडोंसे ऊपर है ।

जिस दिन देखउसे पाएगामनुज ज्ञान के बल सेरह न जाएगी उलझ दृष्टि जबमुकुट और वल्कल से ।

उस दिन होगा सुप्रभातनर के सौभाग्य उदय काउस दिन होगा शंख ध्वनितमानव की महा विजय का ।

धर्मराज, गंतव्य देश है दूरन देर लगाओइस पथ पर मानव समाज कोकुछ आगे पहुंचाओ ।

सच है, मनुज बड़ा पापी हैनर का वध करता हैपर, भूलो मत, मानव के हितमानव ही मरता है ।

लोभ, द्रोह, प्रतिशोध, वैरनरता के विघ्न अमित हैंतप, बलिदान, त्याग के संबलभी न किन्तु, परिमित हैं ।

प्रेरित करो इतर प्राणी कोनिज चरित्र के बल सेभरो पुण्य की किरण प्रजा मेंअपने तप निर्मल से ।

मत सोचो दिन-रात पाप मेंमनुज निरत होता हैहाय, पाप के बाद वही तोपछताता रोता है ।

यह क्रंदन, यह अश्रु मनुज कीआशा बहुत बड़ी हैबतलाता है यह, मनुष्यताअब तक नहीं मरी है ।

सत्य नहीं पातक की ज्वालामें मनुष्य का जलनासच है बल समेट कर उसकाफिर आगे को चलना ।

नहीं एक अवलंब जगत काआभा पुण्य व्रती कीतिमिर-व्यूह में फंसी किरण भीआशा है धरती की ।

फूलों पर आँसू के मोतीऔर अश्रु में आशामिट्टी के जीवन की छोटीनपी-तुली परिभाषा ।

आशा के प्रदीप कोजलाए चलो धर्मराज,एक दिन होगी मुक्तभूमिरण-भीति से ।

भावना मनुष्य की नराग में रहेगी लिप्त,सेवित रहेगा नहींजीवन अनीति से ।

हार से मनुष्य कीन महिमा घटेगी और,तेज न बढ़ेगा किसीमानव की जीत से ।

स्नेह-बलिदान होंगेमाप नरता के एक,धरती मनुष्य कीबनेगी स्वर्ग प्रीति से ।

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MLA 9 Ramdhari Singh "Dinkar". “कुरुक्षेत्र – षष्ठ सर्ग.” Mansarovar Sahitya, https://www.mansarovarsahitya.in/poems/%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%b7%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a0-%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/. Accessed 8 Aug. 2026.
Chicago 17 Ramdhari Singh "Dinkar". “कुरुक्षेत्र – षष्ठ सर्ग.” Mansarovar Sahitya. Accessed August 8, 2026. https://www.mansarovarsahitya.in/poems/%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%b7%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a0-%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/.
Reference रामधारी सिंह ‘दिनकर’। «कुरुक्षेत्र – षष्ठ सर्ग»। Mansarovar Sahitya, https://www.mansarovarsahitya.in/poems/%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%b7%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a0-%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/।
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