Poetic form: <span>पद</span>
छाप तिलक सब छीनी
गुरु से आँख मिलते ही भक्त की पहचान — छाप और तिलक — छिन जाती है। लौकिक प्रेम की शब्दावली में लिखा…
मोको कहाँ ढूँढ़े बन्दे
तीर्थ, मूर्ति और कर्मकाण्ड को एक-एक कर नकारता हुआ पद, जिसकी टेक हर बार वहीं लौटती है — मैं तो तेरे पास…
વૈષ્ણવ જન તો
वैष्णव कौन है — इसका उत्तर पूजा से नहीं, आचरण से दिया गया पद। इसीलिए यह भजन एक धार्मिक पद से आगे…
मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो
माखन-चोरी का सबसे प्रसिद्ध पद — बालक कृष्ण की पूरी सफ़ाई, तर्क सहित, और अन्त में एक चतुर उलाहना।
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो
सतगुरु से मिली अमोलक वस्तु का पद — जिसे न चोर ले जा सकता है, न ख़र्च से घटती है।
मेरे तो गिरधर गोपाल
घर, कुल और लोक-लाज छोड़ने का घोषणा-पत्र। पद की टेक ही उसका तर्क है — दूसरा कोई नहीं।
माधव, बहुत मिनति करि तोय
विद्यापति का सबसे गाया जाने वाला विनय-पद। तुलसी और तिल देकर भक्त अपनी देह समर्पित करता है और केवल एक बात माँगता…