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गीत · आत्म-सम्बोधन · बबूल के फूल

पता नहीं क्या सोच सुधाकर रखा मेरा नाम

आत्म-विवेचन

पता नहीं क्या सोच सुधाकर रखा मेरा नाम ।बीता नित्य तमस में जीवन, बना मैं ज्योतित धाम ।पता नहीं क्या सोच सुधाकर रखा मेरा नाम ।।

सीधा पन्थ न चलना सीखा, चला दुरंगी चाल ।कपट भरे मम काम देखकर, डरता मुझसे काल ।पावन प्राण न देखे मैंने, देखी गोरी चाम ।

पता नहीं क्या सोच सुधाकर रखा मेरा नाम ।।

पीड़ पोटली सिर पर रखकर, भटक रहा हूँ नित्य ।सुख का चाँद छिपा बदली में, दम के दुःख आदित्य ।।सद्भावों का दूध गिराकर, पीटा दुर्मति जाम ।

पता नहीं क्या सोच सुधाकर रखा मेरा नाम ।।

शंका भरी नजर से मुझको, देखा सबने रोज ।एक बूँद विश्वास न पाया, रहा इसी का शोक ।गलियों से गुजरा हूँ प्रतिपल, चला न रस्ता आम ।

पता नहीं क्या सोच सुधाकर रखा मेरा नाम ।।

In English

A poet questions his own pen name: Sudhakar means the moon, yet the life it named was spent in darkness. Each stanza of self-reckoning returns to that one line.

Commentary

अपने ही नाम से प्रश्न — «सुधाकर» अर्थात् चन्द्रमा, और जीवन तमस में बीता। कवि का आत्म-सम्बोधन, टेक-सहित।

Manuscript, source and citation

पाठ मानसरोवर साहित्य को कवि-परिवार द्वारा उपलब्ध कराया गया।

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MLA 9 Sudhakar Srivastava 'Sudhakar'. “पता नहीं क्या सोच सुधाकर रखा मेरा नाम.” Mansarovar Sahitya, https://www.mansarovarsahitya.in/poems/poem-pata/. Accessed 12 Oct. 2026.
Chicago 17 Sudhakar Srivastava 'Sudhakar'. “पता नहीं क्या सोच सुधाकर रखा मेरा नाम.” Mansarovar Sahitya. Accessed October 12, 2026. https://www.mansarovarsahitya.in/poems/poem-pata/.
Reference सुधाकर श्रीवास्तव। «पता नहीं क्या सोच सुधाकर रखा मेरा नाम»। Mansarovar Sahitya, https://www.mansarovarsahitya.in/poems/poem-pata/।

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